सर्द तूफ़ान और सुलगते राज़

पहाड़ों पर जब मौसम बिगड़ता है, तो वह संभलने का कोई मौका नहीं देता। कुछ ही मिनटों में वह खूबसूरत और सुहानी शाम एक खौफनाक सफेद अँधेरे में बदल चुकी थी।

गाड़ी के शीशों पर अब बर्फ के छोटे-छोटे टुकड़े नहीं, बल्कि मोटी-मोटी परतें चिपक रही थीं। वाइपर पूरी ताकत से चल रहे थे, मगर बर्फ गिरने की रफ्तार इतनी तेज़ थी कि शीशा हर दो सेकंड में फिर से धुंधला हो जाता। बाहर हवाओं का शोर इतना भयानक था कि लग रहा था जैसे कोई विशाल दैत्य पहाड़ों के बीच चीख-चीखकर गर्ज रहा हो।

आस्था ने अपनी सीटबेल्ट को और कसकर पकड़ लिया। उसकी धड़कनें अब तेज़ होने लगी थीं। उसने बाहर देखने की कोशिश की, लेकिन खिड़की के शीशों पर बाहर से बर्फ जमा हो रही थी और अंदर से उसके डर की भाप।

“अंकल… क्या हम रुक नहीं सकते?” आस्था की आवाज़ में अब साफ़ काँपन था।

“इस संकरी सड़क पर गाड़ी रोकना और भी खतरनाक है आस्था,” अजय की आवाज़ सख्त थी, लेकिन उसमें घबराहट नहीं, बल्कि एक गहरी एकाग्रता थी। उसकी दोनों आँखें सामने उस सड़क को तलाश रही थीं, जो अब पूरी तरह सफेद चादर में गायब हो चुकी थी। “अगर हम यहाँ रुके, तो पीछे से आने वाली कोई भी गाड़ी इस धुंध में हमें देख नहीं पाएगी और सीधा हमसे टकरा जाएगी। हमें कोई ढाबा या चौड़ी जगह ढूँढनी ही होगी।”

अजय की SUV बहुत धीमी, लगभग रेंगती हुई रफ्तार से आगे बढ़ रही थी। अचानक सड़क के एक तीखे मोड़ पर, जहाँ बर्फ के नीचे शायद बारिश का कीचड़ जमा था, SUV के पिछले टायरों ने अपनी पकड़ छोड़ दी।

“ओह शिट!” अजय के मुँह से अचानक निकला।

गाड़ी हल्की सी बाईं तरफ खिसकी — खाई की तरफ!

आस्था के मुँह से एक हल्की सी चीख निकल गई और उसने अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं। अजय ने तुरंत स्टीयरिंग को बहुत सधे हुए हाथों से विपरीत दिशा में घुमाया और ब्रेक पर हल्का सा दबाव डाला। गाड़ी खाई की तरफ जाने से तो बच गई, लेकिन वह फिसलकर सड़क के दाईं तरफ पहाड़ से सटी एक गहरी नालीनुमा कच्ची ज़मीन में जा धँसी।

गाड़ी एक ज़ोरदार झटके के साथ रुक गई। इंजन की आवाज़ अचानक बंद हो गई और उस बंद केबिन में सिर्फ बाहर चल रहे तूफ़ान की भयानक सनसनाहट रह गई।

आस्था की साँसें बुरी तरह ऊपर-नीचे हो रही थीं। उसका दिल पसलियों से टकरा रहा था।

“तुम ठीक हो?” अजय ने तुरंत उसकी तरफ मुड़कर पूछा। उसकी आँखों में गहरी चिंता थी।

“हाँ… हाँ… मैं ठीक हूँ,” आस्था ने अपनी साँसों को काबू करते हुए कहा, लेकिन उसके हाथ अभी भी काँप रहे थे।

अजय ने राहत की एक साँस ली और गाड़ी को दोबारा स्टार्ट किया। उसने गियर बदला और एक्सीलरेटर दबाया। इंजन ने ज़ोर से दहाड़ मारी, लेकिन गाड़ी अपनी जगह से एक इंच भी नहीं हिली। पिछले टायर कीचड़ और बर्फ के उस गहरे गड्ढे में बुरी तरह फँस चुके थे। वे बस अपनी ही जगह पर घूम रहे थे।

“डैम इट,” अजय ने स्टीयरिंग व्हील पर हल्का सा हाथ मारते हुए कहा। उसने दो-तीन बार और कोशिश की, लेकिन टायरों के फिसलने की आवाज़ के अलावा कुछ नहीं हुआ।

“क्या हुआ?” आस्था ने घबराते हुए पूछा।

“टायर स्लिप कर रहे हैं। शायद गड्ढा गहरा है। मुझे बाहर जाकर देखना होगा,” अजय ने अपनी जैकेट की ज़िप को गले तक चढ़ाया।

“अंकल, बाहर बहुत भयानक तूफ़ान है! मत जाइए,” आस्था ने डर के मारे अनजाने में ही अजय के जैकेट की बाँह पकड़ ली।

अजय ने उसकी तरफ देखा। आस्था की आँखों में वह डर बिल्कुल सच्चा था। अजय ने बहुत नरमी से अपना हाथ उसके काँपते हाथ पर रखा।

“मैं बस दो मिनट में आ रहा हूँ। तुम दरवाज़ा लॉक कर लेना,” अजय ने उसे तसल्ली दी और दरवाज़ा खोलकर बाहर निकल गया।

दरवाज़ा खुलते ही बाहर की जमा देने वाली हवा का एक तेज़ झोंका गाड़ी के अंदर घुसा, जिसने आस्था के चेहरे को सुन्न कर दिया। उसे एहसास हुआ कि बाहर का तापमान शून्य से भी नीचे चला गया है।

अजय बर्फ के उस तूफ़ान में लगभग अदृश्य हो गया था। आस्था ने शीशे से बाहर झाँकने की कोशिश की। कुछ देर बाद अजय वापस आया। वह पूरी तरह बर्फ से ढका हुआ था। उसके बाल, उसके कंधे, यहाँ तक कि उसकी पलकों पर भी सफेद बर्फ जमी हुई थी। उसने अंदर आकर जल्दी से दरवाज़ा बंद किया।

“हम फँस गए हैं आस्था,” अजय ने अपने बालों से बर्फ झाड़ते हुए एक भारी आवाज़ में कहा। “पीछे का बायाँ टायर लगभग एक फुट गहरे कीचड़ और बर्फ में धँस चुका है। बिना किसी दूसरी गाड़ी या टो-ट्रक की मदद के, इसे यहाँ से निकालना नामुमकिन है।”

आस्था का दिल बैठ गया। “तो… तो अब हम क्या करेंगे? पापा… पापा को फोन करते हैं। वो आगे ही होंगे।”

उसने काँपते हाथों से अपना फोन उठाया। लेकिन स्क्रीन देखकर उसकी बची-खुची उम्मीद भी टूट गई।

“नो सिग्नल,” आस्था ने लगभग रुआँसी आवाज़ में कहा। “नेटवर्क पूरी तरह से चला गया है।”

अजय ने अपना फोन चेक किया। उसकी स्क्रीन पर भी ‘Emergency Calls Only’ लिखा आ रहा था।

सन्नाटा… एक ऐसा सन्नाटा जो तूफ़ान के शोर से भी ज़्यादा भयानक था।

अजय ने एक गहरी साँस ली और अपनी सीट पर पीछे टेक लगा दी। उसने खिड़की से बाहर उस अनियंत्रित तूफ़ान को देखा और फिर आस्था की तरफ मुड़ा।

“तुम्हारे पापा हमसे काफी आगे निकल चुके थे, और इस मौसम में उनका वापस आना मुमकिन नहीं है। और सड़क पर कोई और गाड़ी भी नहीं आ रही है,” अजय ने हालात की गंभीरता को समझते हुए बहुत शांत, लेकिन स्पष्ट शब्दों में कहा। “हमें मदद का इंतज़ार करना होगा। और जब तक यह तूफ़ान नहीं रुकता… हमें इसी गाड़ी में रहना होगा।”

आस्था ने अजय की बात सुनी। एक बंद गाड़ी, बाहर मौत जैसी ठंड और शून्य से नीचे गिरता तापमान। और उसके साथ एक ऐसा इंसान, जो कल रात तक उसके लिए महज़ एक ‘बोरिंग पड़ोसी’ था, लेकिन अब इस खौफनाक हालात में उसकी ज़िंदगी की आखिरी उम्मीद बन चुका था।

हालात अब सच में उनके कंट्रोल से बाहर हो चुके थे।

शाम के पाँच बजते-बजते बाहर का नज़ारा किसी डरावनी फिल्म से भी ज़्यादा भयानक हो चुका था। सूरज कब ढल गया, पता ही नहीं चला। चारों तरफ बस एक खौफनाक सफेद अँधेरा फैल गया था — जितनी दूर नज़र जाती, सिर्फ बर्फ, बर्फ और बर्फ। सड़क, पहाड़, खाई — सब कुछ मोटी-मोटी बर्फ की चादर के नीचे दब चुका था। उनकी गाड़ी अब उस विशाल सफेद रेगिस्तान में एक बेकार सा तिनका बनकर फँसी पड़ी थी।

ठंड अब और बढ़ती जा रही थी। हवा की रफ्तार कम होने का नाम नहीं ले रही थी। अजय को पेट्रोल और बैटरी बचाने के लिए हर थोड़ी देर में इंजन और हीटर बंद करना पड़ रहा था। जैसे ही हीटर बंद होता, बाहर की जमा देने वाली ठंड शीशों को चीरती हुई अंदर घुस जाती। तापमान अब शून्य से बहुत नीचे चला गया था। गाड़ी एक इंच भी आगे नहीं हिल पा रही थी — बर्फ ने टायरों को पूरी तरह जकड़ लिया था।

आस्था ने अपनी भारी जैकेट, स्वेटर और मोटी लैगिंग्स के बावजूद खुद को सिकोड़कर बैठ लिया था। उसके दाँत किट-किट-किट बज रहे थे। ठंड अब सिर्फ त्वचा तक सीमित नहीं थी — वह सीधे हड्डियों में उतर रही थी, मांसपेशियों को जमा रही थी। उसके पैर सुन्न हो रहे थे, उँगलियाँ ठंड से दुख रही थीं। शरीर धीरे-धीरे काँपने लगा था, और काँपना रुक ही नहीं रहा था।

“बहुत ठंड लग रही है ना तुम्हें?” अजय ने अपनी गहरी, भारी आवाज़ में पूछा। उसने बिना इंतज़ार किए पीछे की सीट से एक मोटा, गर्म वूलन ब्लैंकेट निकाला और आस्था के कंधों, छाती और पैरों पर कसकर लपेट दिया। ब्लैंकेट का गर्म स्पर्श मिला तो आस्था ने राहत की साँस ली, लेकिन ठंड अब उसके अंदर तक घुस चुकी थी।

“थैंक… यू अंकल…” उसके होंठ काँप रहे थे, आवाज़ फटी-फटी निकल रही थी।

लेकिन ठंड ने अब एक और प्राकृतिक मुसीबत पैदा कर दी थी। पिछले डेढ़ घंटे से फँसी आस्था को धीरे-धीरे अपने ब्लैडर में दबाव महसूस होने लगा। ठंड के कारण उसका पेशाब सिकुड़ रहा था और अब जोर-जोर से दबाव बन रहा था। शुरू में उसने बहुत कोशिश की — पैर कसकर क्रॉस किए, ब्लैंकेट को और कस लिया, पेट को अंदर खींचा। लेकिन बीस मिनट बाद हालात बेकाबू हो गए। पेट के निचले हिस्से में तीखा दर्द उठने लगा। मूत्राशय फटने जैसा लग रहा था।

आखिरकार, जब बर्दाश्त की हद पार हो गई, तो आस्था का चेहरा शर्म से लाल हो गया। उसने नज़रें झुकाते हुए, काँपती आवाज़ में कहा,

“अं… अंकल… मुझे… मुझे बाहर निकलना है। बहुत जोर से सुसु लगी है। मैं… मैं कंट्रोल नहीं कर पा रही… प्लीज…”

गाड़ी के अंदर एक पल को सन्नाटा छा गया। अजय ने तुरंत समझ लिया कि ये कोई शरारत या हँसी-मज़ाक नहीं था। ये मजबूरी थी।

“ठीक है आस्था, घबराओ मत,” उसने शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा। “बाहर तूफ़ान बहुत तेज़ है, हवा तुम्हें उड़ा सकती है। मैं दरवाज़ा खोलता हूँ। तुम गाड़ी के बाईं तरफ, पिछले टायर के पास चली जाना। गाड़ी की ओट में हवा कम लगेगी। मैं इधर खड़ा हूँ, कोई बात नहीं।”

अजय ने अपनी तरफ का दरवाज़ा खोला। तेज़ हवा और बर्फीले कण उसके चेहरे पर पड़े। वह बाहर खड़ा हो गया ताकि आस्था को थोड़ा शेल्टर मिल सके। आस्था काँपते पैरों से पैसेंजर सीट से उतरी। बाहर कदम रखते ही ठंड ने उसे जैसे बर्फीले पानी में डुबो दिया। वह लड़खड़ाती हुई गाड़ी के दूसरे तरफ गई, बॉडी से सटकर घुटनों पर बैठ गई।

ठंड से उसकी उँगलियाँ सुन्न हो चुकी थीं, लेकिन उसने किसी तरह अपनी लैगिंग्स और पैंटी को नीचे खींचा। ठंडी हवा सीधे उसके नंगे निचले हिस्से पर पड़ी तो वह सिहर उठी। फिर उसने खुद को छोड़ दिया।

“sssssssssshhhhhhhh…”

आस्था का पेशाब जोर-जोर से निकलने लगा। गर्म, पीली धार बर्फ पर पड़कर हल्की-हल्की सीटी की तरह आवाज़ कर रही थी — छप… छप… छप… गर्म पेशाब बर्फ को पिघलाता हुआ नीचे जा रहा था। आवाज़ तेज़ थी, साफ़ थी, और तूफ़ान के शोर के बावजूद सीधे अजय के कानों तक पहुँच रही थी।

अजय, जो गाड़ी के दूसरी तरफ खड़ा था, अचानक ठिठक गया। वो 38 साल का मर्द था, जिसकी रगों में खून अभी भी गर्म था। उस जवान लड़की की निजी, गर्म, गीली आवाज़ ने उसके अंदर कुछ हिला दिया। उसके लिंग में हल्की-सी सिहरन हुई। ‘अर्जुन की छोटी बेटी’ वाली छवि एक पल में टूट गई। अब वो सिर्फ एक नंगी, कमज़ोर, जवान औरत थी — जो ठंड में अपना पेशाब कर रही थी। उसकी साँसें थोड़ी भारी हो गईं। उसने खुद को संभाला, लेकिन वो अहसास शरीर में उतर चुका था — गर्म, निषिद्ध, और बेहद कच्चा।

कुछ सेकंड बाद आस्था का सुसु रुका। वह जल्दी से अपनी पैंटी और लैगिंग्स ऊपर खींची, काँपती हुई गाड़ी के अंदर वापस आ गई और ब्लैंकेट में दुबक गई। उसके गाल शर्म और ठंड से लाल थे।

“तुम अंदर बैठो, मैं भी आ रहा हूँ,” अजय ने भारी आवाज़ में कहा। आस्था की सुसु की आवाज़ सुनकर अब उसे भी जोर से पेशाब लग रहा था।

अजय गाड़ी के आगे की तरफ गया। उसने अपनी जैकेट की ज़िप खोली, पैंट की ज़िप नीचे की और अपना मोटा, भारी लिंग बाहर निकाला। ठंड में भी उसका लिंग आधा खड़ा-सा महसूस हो रहा था। उसने जोर से पेशाब छोड़ दिया।

“hhhhhhhhsssssssss…”

उसकी धार बहुत जोरदार और लंबी थी — गर्म पेशाब बर्फ पर पड़कर तेज़ आवाज़ कर रहा था।

अंदर बैठी आस्था की साँसें तेज़ हो गई थीं। वह ब्लैंकेट के अंदर से, बहुत चुपके से, कनखियों से विंडशील्ड की तरफ देख रही थी। बर्फ जमी होने के बावजूद हेडलाइट्स की हल्की चमक में अजय का चौड़ा, मर्दाना सिल्हूट साफ़ दिख रहा था — उसकी लंबी पीठ, मोटी जाँघें, और हाथ में पकड़ा हुआ वो मोटा, लटकता हुआ लिंग जो जोर-जोर से पेशाब छोड़ रहा था। धार की आवाज़, उसकी बनावट, सब कुछ देखते हुए आस्था के पेट में गुदगुदाहट हुई। उसके निप्पल सख्त हो गए। वो सिर्फ ‘अंकल’ नहीं था — वो एक पूरा, मर्दाना पुरुष था। और इस वक्त, इस सर्द अँधेरे में, उसकी ज़िंदगी पूरी तरह उसी पर टिकी थी।

अजय ने ज़िप बंद की और अंदर आकर दरवाज़ा बंद कर दिया। गाड़ी में फिर सन्नाटा छा गया। लेकिन अब वो सन्नाटा पहले जैसा बेगुनाह नहीं था। उस छोटी-सी मजबूरी ने दोनों के बीच की दीवार को चूर-चूर कर दिया था। अब हवा में सिर्फ ठंड नहीं, बल्कि एक अनचाहा, गर्म, खतरनाक आकर्षण भी घुल चुका था — जो धीरे-धीरे और गहरा होता जा रहा था।

ब्लैंकेट के नीचे आस्था की उँगलियाँ अनजाने में अपनी जाँघों को दबा रही थीं। अजय की साँसें भी अब सामान्य नहीं थीं। दोनों जानते थे — ये रात अभी बहुत लंबी होने वाली है। 

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