स्क्रीन के पीछे का सच.

छत पर बारिश की तेज़ धाराओं का शोर अभी भी कानों को पूरी तरह सुन्न किए हुए था, लेकिन इन दोनों के बीच की दुनिया एकदम शांत, नरम और गहरी गरमाहट से भर चुकी थी। राजेश के होंठ जब नेहा के होंठों से अलग हुए, तो दोनों की साँसें तेज़, भारी और अनियंत्रित हो रही थीं। नेहा की आँखें अभी भी बंद थीं, जैसे वह उस गहरे, जादुई किस के नशे से बाहर आना ही नहीं चाहती थी। उसके होंठ अब भी सूजे हुए, लाल और गीले चमक रहे थे, राजेश की जीभ की याद में हल्के-हल्के काँप रहे थे।

राजेश ने उसके भीगे, नम चेहरे को अपने बड़े-बड़े, मजबूत हाथों में सहेज लिया। उसके अँगूठे नेहा के गालों को प्यार से सहलाते हुए नीचे की ओर फिसल गए, फिर उसकी ठोड़ी को हल्के से ऊपर उठा दिया। बारिश की ठंडी बूंदों के बावजूद नेहा का चेहरा बुखार की तरह जल रहा था। उसकी गर्म साँसें राजेश के चेहरे पर लगातार पड़ रही थीं।

“नीचे चलो, बीमार पड़ जाओगी,” राजेश ने बहुत धीमी, लेकिन गहरी और पूरी तरह अधिकारपूर्ण आवाज़ में कहा। उसकी आवाज़ में अब एक दबी हुई कसक थी, जैसे वह खुद को काबू में रखने के लिए अंदर ही अंदर जूझ रहा हो।

उसने नेहा का हाथ थाम लिया। उनकी उँगलियाँ इस कदर आपस में गुँथ गईं, जैसे वे जन्म से ही एक-दूसरे के लिए बनी हों। दोनों पूरी तरह बारिश में भीग चुके थे। वे छत की मुंडेर से दूर, पुरानी कोठी की घुमावदार, संकरी लकड़ी की सीढ़ियों की ओर बढ़े। उनके भीगे जूतों की चप-चप और नेहा की पायलों की छम-छम की आवाज़ उन पुरानी सीढ़ियों पर गूँज रही थी। नेहा की भीगी चूड़ियाँ उसकी कलाई पर हल्के से बज रही थीं। हर कदम पर उसका गीला सूट उसके शरीर से और ज़्यादा चिपकता जा रहा था।

नीचे राजेश के कमरे का दरवाज़ा पहले से ही खुला हुआ था। अंदर पीले रंग का पुराना लैंप हल्की, नरम और बेहद सुकून भरी रोशनी बिखेर रहा था, जो पूरे कमरे को सुनहरे, गर्म आलोक में डुबोए हुए था। जैसे ही वे दोनों अंदर दाखिल हुए, बाहर के तूफ़ान का शोर अचानक बहुत दूर और धीमा पड़ गया।

कमरे के पुराने लकड़ी के फर्श पर उनके कपड़ों से पानी टपक-टपक कर गिर रहा था। एसी न होने के बावजूद बारिश की ठंडी हवा कमरे में भर गई थी। नेहा हल्के से सिहर उठी। उसने दोनों हाथों से अपनी बाँहों को रगड़ने की कोशिश की, लेकिन उसका सूती सूट अब पूरी तरह उसके शरीर से चिपका हुआ था। उसके गीले स्तन साफ़ दिख रहे थे—गोल, भरे-पूरे और ठंड से सिकुड़े हुए निप्पल पतले कपड़े के ऊपर से स्पष्ट रूप से उभर आए थे। उसकी कमर की गहराई, पेट की नाभि और जाँघों की नरम, मांसल आकृति सब कुछ जैसे नंगा होकर झाँक रहा था।

राजेश की नज़र एक पल के लिए वहीं अटक गई। उसकी आँखें नेहा के भीगे स्तनों पर, फिर उसकी भीगी जाँघों पर घूम गईं। उसकी साँसें और भारी हो गईं। लेकिन उसने खुद को संभाला, गले में एक हल्की गुर्राहट दबाई और पुरानी लकड़ी की अलमारी की तरफ मुड़ गया। उसने एक बड़ा, साफ़ तौलिया निकाला।

उसने तौलिए को नेहा की तरफ बढ़ाने की बजाय खुद अपने हाथों में लेकर उसके सिर पर रख दिया।

नेहा ने आँखें उठाकर राजेश को देखा। राजेश बेहद धीरे-धीरे, बेहद नाज़ुकता और गहरी भूख के साथ उसके बालों को पोंछने लगा। तौलिए का नरम स्पर्श उसके गीले बालों से होते हुए गर्दन तक उतर रहा था। इस नज़दीकी में एक अनोखी, गहरी अंतरंगता थी—कोई भी पुरुष उसे इस तरह कभी नहीं छूता था। कोई इस तरह उसकी परवाह नहीं करता था।

नेहा की नज़रें राजेश की भीगी शर्ट के खुले कॉलर पर टिक गईं। उसका चौड़ा, बालों वाला सीना साफ़ दिख रहा था—मजबूत, बारिश और पसीने से चमकता हुआ, हर साँस के साथ ऊपर-नीचे उठता-गिरता। शर्ट के नीचे उसकी छाती के घने बाल और सख्त मांसपेशियाँ पूरी तरह नज़र आ रही थीं।

“मैं खुद कर लूँगी,” नेहा ने बहुत धीमी, काँपती हुई आवाज़ में कहा, लेकिन उसके हाथों ने तौलिए को पकड़ने की कोई कोशिश नहीं की। उलटे वे राजेश की कमर के पास हल्के से टिके रहे।

“मुझे पता है,” राजेश ने गहरी, भारी आवाज़ में कहा और तौलिए को नीचे सरकाकर पास की कुर्सी पर फेंक दिया।

अब उनके बीच कोई दीवार नहीं बची थी।

राजेश थोड़ा और आगे झुका। उसने नेहा के चेहरे से गीली लट को हटाया और उसे उसके कान के पीछे सरका दिया। उसकी खुरदरी, मोटी उँगलियाँ जब नेहा की ठंडी, नरम गर्दन से टकराईं, तो नेहा के मुँह से एक हल्की, कामुक आह निकल गई—“आह…”

“तुम काँप रही हो,” राजेश की आवाज़ में अब जंगली सी कशिश थी। उसकी आँखें बार-बार नेहा के होंठों और स्तनों पर जा रही थीं।

“यह ठंड की वजह से नहीं है,” नेहा ने उसकी आँखों में गहरी नज़र डालते हुए जवाब दिया। उसकी आवाज़ में एक साफ़, खुला आमंत्रण था।

राजेश का धैर्य अब पूरी तरह टूट चुका था। उसने अपना एक मजबूत हाथ नेहा की कमर के पीछे रखा—उँगलियाँ उसके सूट के नीचे की नरम, गर्म त्वचा पर दब गईं—और उसे एक झटके से अपनी तरफ खींच लिया। नेहा का भीगा, नरम, गरम शरीर राजेश के सख्त, चौड़े सीने से ज़ोर से टकराया। उसके भरे-पूरे स्तन राजेश की छाती से दब गए, निप्पल सख्त होकर साफ़ महसूस हो रहे थे।

छत वाला किस बारिश की बेकाबू जंगलीपन का हिस्सा था, लेकिन यह वाला… यह बहुत धीमा, गहरा और भूखा था।

राजेश के होंठ दोबारा नेहा के होंठों से मिले। इस बार उसने नेहा के निचले होंठ को हल्के से काटा, फिर अपनी जीभ से उसे चाट लिया। नेहा ने मुँह खोल दिया और राजेश की जीभ को अपने मुँह में ले लिया। उनकी जीभें एक-दूसरे से लिपट गईं, चूसने लगीं, एक-दूसरे का स्वाद लेते हुए। नेहा ने अपने दोनों हाथ राजेश की गर्दन के पीछे डाल दिए, उसके बालों में उँगलियाँ फेरते हुए उसे और गहराई से खींच लिया।

कमरे में पुरानी किताबों, ओल्ड स्पाइस और अब बारिश की सौंधी खुशबू के साथ उनकी बढ़ती उत्तेजना की गंध भी घुलने लगी थी। राजेश के सख्त हाथ नेहा की कमर को इतनी मज़बूती से पकड़े हुए थे कि नेहा को लगा जैसे वह पिघल जाएगी। उसकी उँगलियाँ धीरे-धीरे नीचे सरक रही थीं, नेहा की नितंबों की गोलाई को हल्के से दबाते हुए।

राजेश के होंठ नेहा के होंठों को छोड़ते हुए उसकी ठंडी गर्दन पर खिसक गए। वहाँ पहले उँगलियों से छुआ था, अब गर्म, गीले होंठों और जीभ से चूसने लगा। नेहा के मुँह से एक गहरी, कामुक सिसकी निकली—“उम्म्म… राजेश…”—जो कमरे की खामोशी में गूँज गई। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं, सिर पीछे झुका दिया और छाती आगे कर दी, ताकि राजेश उसके स्तनों तक आसानी से पहुँच सके।

राजेश ने एक हाथ से नेहा की कमर को और कसकर पकड़ा, दूसरे हाथ से उसके गीले बालों को पीछे खींचा। उसकी साँसें नेहा की गर्दन पर गर्म-गर्म पड़ रही थीं। बाहर बारिश अभी भी तेज़ हो रही थी, लेकिन उस पुराने कमरे के बंद दरवाज़े के पीछे, दो पूरी तरह अलग दुनियाओं के बीच की सारी दूरियाँ अब मिट चुकी थीं। वे दोनों बस एक-दूसरे में खो रहे थे—धीरे-धीरे, गहरे किसों, गर्म स्पर्शों और बढ़ती हुई उत्तेजना के साथ—बिल्कुल उस पुरानी धुन की तरह जो अब अपने चरम की तरफ बढ़ रही थी। 

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