उधड़े धागे।

मेरा नाम प्रोफेसर रेहान अहमद है। उम्र 43 साल। मैं शहर के एक नामी-गिरामी कॉलेज में पढ़ाता हूँ। बाहर से देखने वाले को मैं बेहद गंभीर, सिद्धांतों का पाबंद और चुप-चाप अपनी दुनिया में रहने वाला आदमी लगता हूँ। मेरे इस विशाल अपार्टमेंट में सिर्फ किताबों के ढेर और पुरानी ग़ज़लों की आवाज़ें ही बसती थीं। कोई और चीज़ वहाँ घुसने की हिम्मत नहीं करती थी। लेकिन सच तो यह है कि एक अकेले और अनुभवी मर्द के अंदर की इच्छाएँ कभी बूढ़ी नहीं होतीं।

वे बस राख की परत के नीचे धीरे-धीरे सुलगती रहती हैं, सही मौके की चिंगारी का इंतज़ार करती हुईं। और वह चिंगारी मेरी ज़िंदगी में मेरे बचपन के दोस्त तारिक के माध्यम से आई। जनवरी की एक ठंडी, हल्की बारिश वाली शाम थी। मैं सोफे पर लेटकर ब्लैक कॉफी का घूँट ले रहा था कि अचानक फोन की घंटी बज उठी। स्क्रीन पर ‘तारिक’ का नाम चमक रहा था। “हेलो तारिक, क्या हाल हैं?” मैंने शांत स्वर में पूछा। “रेहान यार, हालत बिल्कुल ठीक नहीं है,” दूसरी तरफ से तारिक की घबराई हुई आवाज़ आई। “बेगम के घर वाले परिवार में इमरजेंसी आ गई है। हमें तुरंत मेरठ जाना पड़ रहा है।” “कोई गंभीर बात तो नहीं?” मैं सीधे बैठते हुए पूछा। “हाँ, हालात वैसे ही हैं। लेकिन एक बड़ी समस्या और है यार।

ज़ोया के कॉलेज के एग्ज़ाम चल रहे हैं, उसे साथ ले जाना नामुमकिन है। नीचे वाले किराएदार भी इस वक्त शहर से बाहर हैं। मुझे समझ नहीं आ रहा कि उसे अकेला छोड़कर कैसे जाऊँ…” मैंने उसकी परेशानी तुरंत भाँप ली और बिना सोचे कहा, “इसमें इतना सोच-विचार करने की क्या ज़रूरत है तारिक? ज़ोया मेरी भी बेटी जैसी है।

तुम उसे मेरे पास छोड़ जाओ। जब तक तुम लोग वापस नहीं आते, वह यहाँ आराम से रहेगी।” तारिक ने गहरी राहत की साँस ली, जैसे कोई भारी बोझ उसके सिर से उतर गया हो। “शुक्रिया रेहान। बस एक बात का ध्यान रखना। एक बार पहले भी जब वह घर पर अकेली थी, तो पता चला कि कोई लड़का उसके साथ रुकने आया था। आजकल के बच्चों पर भरोसा नहीं… थोड़ा नज़र रखना उस पर।” तारिक पिता की चिंता में यह बात कह रहा था, लेकिन मेरी अनुभवी नसों में एक अजीब-सी लहर दौड़ गई।

जो लड़की अपने घर में अकेले किसी लड़के को बुला सकती है, वह कोई नादान बच्ची कतई नहीं हो सकती। अगले दिन सुबह ठीक सात बजे दरवाज़े की घंटी बजी। मैंने दरवाज़ा खोला तो सामने तारिक खड़ा था और ठीक उसके पीछे ज़ोया। तारिक ने जल्दी में हाथ मिलाया, “रेहान, मुझे तुरंत निकलना है, बेगम नीचे गाड़ी में इंतज़ार कर रही है। मैंने इसका सामान अंदर रख दिया है। अल्लाह हाफ़िज़!” मैं कुछ कह पाता, इससे पहले तारिक लिफ्ट की तरफ दौड़ चुका था।

अब दरवाज़े पर सिर्फ ज़ोया खड़ी थी। उसने ढीला-ढाला काला गोल गला वाला टी-शर्ट और नीली कैप्री पहनी हुई थी। उम्र सिर्फ 19 साल, गोरा चमकदार रंग, पाँच फुट पाँच इंच की छरहरी और कसी हुई देह। ढीले कपड़ों के बावजूद उसकी खूबसूरती के उभार साफ़ दिख रहे थे। उसने अपनी बड़ी-बड़ी गहरी भूरी आँखें उठाईं और सीधे मेरी आँखों में देखा। “अस्सलाम वालेकुम, रेहान अंकल,” उसकी आवाज़ में एक अनोखी खनक और बेधड़कपन था। “वालेकुम अस्सलाम। अंदर आ जाओ ज़ोया,” मैंने रास्ता देते हुए कहा। वह अंदर आई और पूरे घर को गहरी नज़र से देखने लगी। “आपका घर तो बिल्कुल वैसा ही है जैसा अब्बू बताया करते थे। एकदम शांत, साफ-सुथरा… और थोड़ा बोरिंग। यहाँ किसी औरत की एक बिंदी तक नहीं दिखती।” मैं उसकी इस बेधड़क टिप्पणी पर थोड़ा हक्का-बक्का रह गया, “आदत पड़ गई है इस सन्नाटे की ज़ोया। वैसे, तुम्हारा कमरा दाईं तरफ है। आराम से बैठो।” “मुझे 9 बजे कॉलेज निकलना है अंकल, बस दो घंटे के लिए,” उसने बाल झटकते हुए कहा।

मेरी नौकरानी मैरी किचन में नाश्ता तैयार कर रही थी। मैं वापस सोफे पर बैठकर अखबार पढ़ने लगा। कुछ देर बाद ही ज़ोया बाहर आई। उसके हाथ में तौलिया और कुछ कपड़े थे। “रेहान अंकल?” उसने हल्की आवाज़ में पुकारा। मैंने अखबार से नज़र हटाई, “हाँ ज़ोया, बोलो?” “वो… मेरे कमरे के बाथरूम में नहाने का कोई इंतज़ाम नहीं है। शायद आप उसे सिर्फ कपड़े धोने के लिए इस्तेमाल करते हैं। वहाँ साबुन भी नहीं है।” वह एक मासूम-सी झिझक के साथ खड़ी थी। “ओह, माफ़ करना।

मैंने ध्यान नहीं दिया,” मैंने अखबार मोड़कर टेबल पर रखते हुए कहा। “तुम मेरे बेडरूम का बाथरूम इस्तेमाल कर लो। मुझे अभी तैयार होने में थोड़ा वक्त लगेगा।” “थैंक यू, अंकल,” उसके चेहरे पर एक प्यारी मुस्कान खिल गई और वह बेझिझक मेरे कमरे की तरफ चली गई। लगभग पंद्रह मिनट बाद जब वह बाहर निकली, तो नहाने के बाद उसके गीले बालों से एक मीठी, नशीली खुशबू पूरे ड्राइंग रूम में फैल गई। उसने पीले रंग का सूट पहन रखा था। “मैं निकल रही हूँ अंकल, करीब एक बजे तक लौट आऊँगी,” उसने बालों को तौलिए से सुखाते हुए कहा। “ठीक है। ये घर की एक्स्ट्रा चाबी रख लो, ताकि तुम्हें दरवाज़े पर इंतज़ार न करना पड़े,” मैंने चाबी उसके हाथ में थमाई और मैरी से कहा कि वह अपना काम खत्म करके जा सकती है। थोड़ी देर बाद घर पूरी तरह खाली हो गया। मैं तैयार होने के लिए अपने बेडरूम के बाथरूम की तरफ बढ़ा।

मेरे दिमाग में बस ज़ोया की वह हल्की-सी खुशबू और उसका मुस्कुराता चेहरा घूम रहा था। जैसे ही मैंने बाथरूम का दरवाज़ा खोला… मेरे पैर वहीं थम गए। बाथरूम की खूंटी पर ज़ोया की रात वाली कैप्री और टी-शर्ट लटक रही थी। लेकिन मेरी नज़र खूंटी पर नहीं, नीचे गीले फर्श पर अटक गई थी। वहाँ ज़ोया की ब्रा और पैंटी पड़ी थीं। उन्हें पानी से धोया तो गया था, मगर जान-बूझकर या लापरवाही से, उन्हें सूखने के लिए तार पर नहीं डाला गया था।

इतने सालों की अकेलेपन के बाद, अपने सबसे निजी बाथरूम में 19 साल की जवान लड़की के उन सबसे अंतरंग कपड़ों को देखकर मेरे अंदर सोया हुआ मर्द जैसे बेकाबू हो उठा। मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ा और काँपते हाथों से उन गीले कपड़ों को उठा लिया। सफेद ब्रा पर ‘लवेबल 32B’ का टैग लगा था। फिर उसकी पैंटी – रूपा सॉफ्टलाइन। वह काफी पुरानी थी; किनारों की लेस उधड़ने लगी थी और बीच का हिस्सा घिस चुका था। मैंने उसे अपने चेहरे के बेहद करीब ले जाकर आँखें बंद कर लीं। उसमें नहाने के साबुन की और ज़ोया के बदन की ताज़ा, कच्ची महक थी। वह महक किसी तेज़ नशे की तरह मेरे दिमाग पर छा गई।

मेरे हाथ उस उधड़ी हुई लेस को महसूस कर रहे थे। अंदर एक तूफान उठ खड़ा हुआ था। क्या कोई जवान लड़की इतनी लापरवाह हो सकती है कि वह एक कुंवारे मर्द के बाथरूम में अपने ऐसे कपड़े छोड़ जाए? या फिर यह उसकी तरफ से फेंका गया कोई जाल था? कोई खामोश निमंत्रण? मैं काफी देर तक उसी खुमार में खड़ा रहा। फिर खुद को संभाला, गहरी साँस ली, उन कपड़ों को उठाया और बिना कुछ कहे बालकनी के तार पर सूखने के लिए डाल दिया। उस दिन जब मैं घर से कॉलेज के लिए निकला, तो मेरे चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान थी। मुझे अंदर ही अंदर यह यकीन हो गया था कि मेरी इस उबाऊ ज़िंदगी में जो खामोशी सालों से छाई हुई थी, वह इस एक हफ्ते में पूरी तरह टूटने वाली है। खेल शुरू हो चुका था।

भाग 2: उधड़े धागे

शाम करीब सात बज रहे थे जब मैं कॉलेज से थका-हारा घर लौटा। दरवाज़ा खोलते ही अदरक और इलायची की महक ने मुझे स्वागत किया। मेरे इस सुनसान घर में सालों बाद किसी के होने का एहसास एक अजीब-सा सुकून दे रहा था। ज़ोया सोफे पर पैर समेटकर बैठी थी। उसने गहरे नीले रंग की फिटिंग वाली जींस और सफेद ढीला टॉप पहना हुआ था। मुझे देखते ही उसने टीवी की आवाज़ कम की और बिना कुछ बोले किचन की तरफ चली गई। मैं कपड़े बदलकर जब वापस ड्राइंग रूम में आया, तो टेबल पर दो कप चाय रखे थे। “चाय बहुत स्वादिष्ट बनी है ज़ोया।

बिल्कुल वैसी जैसी मुझे पसंद है,” मैंने एक घूँट लेते हुए कहा। “शुक्रिया रेहान अंकल,” ज़ोया ने अपना कप उठाया। उसकी नज़रें झुकी हुई थीं, लेकिन मुझे पता था कि यह खामोशी किसी तूफान से पहले की खामोशी है। कुछ पल बाद उसने धीरे से कहा, “अंकल… सॉरी। आज सुबह कॉलेज के लिए देर हो रही थी, इसलिए जल्दबाज़ी में मेरे कुछ कपड़े आपके बाथरूम में छूट गए। मुझे आदत नहीं है चीज़ें खुद समेटने की… घर पर अम्मी संभाल लेती हैं।” उसकी आवाज़ में पूरी मासूमियत भरी हुई थी। कोई और होता तो शायद इस मासूमियत पर धोखा खा जाता, लेकिन मेरी उम्र का तजुर्बा उस चेहरे के पीछे छिपी शरारत को साफ़ पढ़ रहा था। मैंने बहुत शांति से कप को तश्तरी पर रखा।

सोफे पर थोड़ा आगे झुककर सीधे उसकी आँखों में देखते हुए बोला, “कोई बात नहीं ज़ोया। वैसे भी मुझे अंदाज़ा नहीं था कि इतने नाज़ुक और हल्के कपड़ों का बोझ तुम कैसे उठाती हो… मुश्किल से 10 ग्राम के तो होंगे वे।” मेरी इस बात पर ज़ोया की आँखें एक पल के लिए फैल गईं। वह समझ गई कि मैंने उसके उन कपड़ों को कितनी बारीकी से देखा है। लेकिन झेंपने की बजाय उसने एक घातक मुस्कान के साथ मुझे देखा और बोली, “आप प्रोफेसर होकर भी हिसाब में इतने कमज़ोर कैसे? मैं पूरी 41 किलो की हूँ… तो वे 10 ग्राम के कैसे हो सकते हैं?” मैंने भी उसी लहजे में तुरंत जवाब दिया, “अच्छा? तो मैं अपना अंदाज़ा सुधार लेता हूँ।

वे 41 ग्राम के होंगे। लेकिन ज़ोया… इतने पुराने और उधड़े हुए धागों को संभालकर रखने का क्या शौक है तुम्हें?” कमरे की हवा अचानक भारी हो गई। मेरे इस डबल मीनिंग वाले सवाल ने ‘अंकल-भतीजी’ वाली शालीनता की दीवार में एक बड़ी दरार डाल दी थी। ज़ोया ने चाय का कप मेज़ पर रखा। अपनी गहरी भूरी आँखों से मुझे भेदते हुए बोली, “पुरानी चीज़ों का अपना अलग मज़ा होता है अंकल। वे जिस्म के सबसे करीब होती हैं और सबसे ज़्यादा वफादार भी। और उधड़ने वाले धागों की बात करें तो… कुछ चीज़ें जब अपनी हद से थोड़ा बाहर झाँकने लगें, तो ज़्यादा खूबसूरत लगती हैं।

आपको नहीं लगता?” मेरा गला सूखने लगा। 19 साल की उस लड़की ने मेरी फेंकी गेंद को बाउंड्री के पार पहुँचा दिया था। मैंने सिर्फ मुस्कुराकर सिर हिला दिया और अखबार देखने का बहाना कर लिया। खेल अब बराबरी का हो चुका था। रात के करीब 11 बज रहे थे। मैं स्टडी रूम में बैठा एक पुरानी अंग्रेज़ी किताब के पन्ने पलट रहा था, लेकिन मेरा पूरा ध्यान घर के उस पार फैले सन्नाटे पर था। तभी दरवाज़े पर हल्की-सी आहट हुई। ज़ोया दरवाज़े के फ्रेम से टिककर खड़ी थी। शायद अभी-अभी उसने चेहरा धोया था। पानी की कुछ बूँदें उसकी ठोड़ी से टपक रही थीं।

उसने जींस-टॉप बदलकर अब एक बहुत ढीला लाल टी-शर्ट पहन रखा था जो उसकी जाँघों तक पहुँच रहा था। “नींद नहीं आ रही ज़ोया?” मैंने चश्मा उतारते हुए पूछा। वह धीरे-धीरे कदम बढ़ाती हुई कमरे के अंदर आई। किताबों से भरी अलमारियों को देखते हुए वह मेरी टेबल के बिल्कुल पास आ खड़ी हुई। “मुझे ऐसी खामोश जगहों पर नींद नहीं आती,” उसने अपनी उँगलियाँ मेरी टेबल पर रखी एक किताब पर फेरते हुए कहा। “आप रात-रात भर इन किताबों में क्या ढूँढते रहते हैं, प्रोफेसर?” (इस बार उसने जानबूझकर ‘अंकल’ की जगह ‘प्रोफेसर’ कहा था)। “मैं वे जवाब ढूँढता हूँ जो आम इंसानों की दुनिया में नहीं मिलते,” मैंने अपनी आवाज़ को नियंत्रित रखने की कोशिश की, हालाँकि उसकी ताज़ा खुशबू मेरे होश उड़ा रही थी।

ज़ोया ने थोड़ा और झुककर टेबल पर अपनी कोहनियाँ टिका दीं। हमारे चेहरों के बीच अब बहुत कम दूरी थी। उसके ढीले टी-शर्ट के कॉलर से उसके गोरे हुस्न की एक झलक मेरी आँखों से टकरा रही थी। “किताबें तो आप बहुत अच्छी पढ़ लेते हैं,” ज़ोया की आवाज़ अब फुसफुसाहट में बदल गई थी, “कभी इंसानों को पढ़ने की कोशिश की है? मसलन… मुझे?” मैंने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं। “मैं वे पन्ने नहीं पढ़ता ज़ोया, जिन्हें पढ़ने के बाद ज़िंदगी का सुकून छिन जाए। और तुम… तुम एक बहुत खतरनाक किताब हो।” ज़ोया के होंठों पर एक विजयी और रहस्यमयी मुस्कान आ गई। उसने अपना हाथ बढ़ाया, मेरे चश्मे को टेबल से उठाकर उँगलियों में घुमाते हुए बोली, “या शायद… आपको डर है कि अगर आपने मुझे पढ़ना शुरू किया, तो आप अपने इस शरीफ और संजीदा प्रोफेसर वाले नकाब को भूल जाएँगे।

आपको डर है कि कहीं आपका वो छिपा हुआ चेहरा बाहर न आ जाए, जिसे आपने इन किताबों के पीछे कैद कर रखा है।” इतना कहकर उसने चश्मा वापस टेबल पर रख दिया, मेरी आँखों में एक गहरी नशीली नज़र डाली और कमरे से बाहर चली गई। मैं कुर्सी पर बुत की तरह बैठा रह गया। मेरी साँसें तेज़ चल रही थीं। उस रात मैं बहुत देर तक सो नहीं पाया। अगली सुबह: तीसरे दिन की सुबह ने मेरे सब्र के बचे-खुचे बाँध भी तोड़ दिए। ज़ोया सुबह 8:30 बजे मेरे पास आई।

वह कॉलेज जाने के लिए तैयार थी। उसने एक घातक अंदाज़ में मुझे देखा और कहा, “अंकल, आज भी मैंने आपके लिए कुछ छोड़ दिया है बाथरूम में… और हाँ, आज मैंने उसे धोया भी नहीं है।” उसके जाने के बाद मैं तेज़ी से बाथरूम में गया। आज ज़मीन पर वे पुराने उधड़े कपड़े नहीं थे। आज खूंटी के नीचे एक बेहद बोल्ड और सेक्सी, गुलाबी रंग का जालीदार ‘स्ट्रिंग बिकनी’ सेट पड़ा था। दोनों पीस बेहद नाज़ुक थे। और जैसा उसने कहा था, उन पर पानी की एक बूँद भी नहीं थी। मैंने काँपते हाथों से उस नाज़ुक कपड़े को उठाया। उसमें से ज़ोया के बदन की ताज़ा, भीनी और कसी हुई महक सीधे मेरे दिमाग में उतर गई। वह महक कोई महक नहीं, एक खुली चुनौती थी। एक दावत थी। मैं समझ गया कि अब सिर्फ बातों और इशारों का खेल खत्म हो चुका है। अब मुझे इस शतरंज की बिसात पर अपना सबसे बड़ा मोहरा चलना होगा।

आगे पढ़े