भाग 1: तीन की भीड़ और एक अधूरी ख्वाहिश
आगरा की उस हल्की ठंडी शाम को, संजय प्लेस के एक कैफे की मद्धम पीली रोशनी मेरे चेहरे पर पड़ रही थी, मगर मेरे अंदर एक अजीब-सी बेचैनी धीरे-धीरे सुलग रही थी। मैं, 24 साल का एक साधारण-सा लड़का, अपनी ब्लैक कॉफी का खाली मग घूरता हुआ बैठा था। मेरे ठीक सामने सोफे पर रिया बैठी थी — वही रिया, जिससे मैं सोशल मीडिया पर हफ्तों चैट करने के बाद आज पहली बार मिल रहा था। वह तस्वीरों जैसी ही लग रही थी; उसकी गहरी आँखें और वो हल्की-सी मुस्कान जो मुझे हर बार अपना दीवाना बना देती थी।
मैं बस उसकी आँखों में देखना चाहता था, उसका हाथ थामकर वो सारी बातें कहना चाहता था जो हमने रात-रात भर जागकर मैसेज पर की थीं। लेकिन हमारे बीच वो दो लड़कियाँ — उसकी सहेलियाँ, श्रुति और मान्या — एक अटूट दीवार की तरह बैठी थीं।
“तो, तुम आगरा में ही पले-बढ़े हो?” श्रुति ने अपनी महंगी फ्रप्पाचीनो का घूँट भरते हुए पूछा। उसकी नज़रों में मुझे परखने वाला भाव साफ़ दिख रहा था।
“हाँ…” मैंने एक हल्की, लेकिन संभाली हुई मुस्कान के साथ जवाब दिया।
रिया ने मुझे बताया था कि उसके घरवाले बहुत सख्त हैं, इसलिए वह अकेली नहीं आ सकती। जब उसने ये बात कही थी, तो मुझे उसकी मासूमियत पर प्यार आया था और मैं मान गया था। लेकिन अब जब मैं देख रहा था कि उसकी सहेलियाँ बिना मेरी तरफ देखे मेन्यू से एक के बाद एक महँगी डिशेज़ ऑर्डर कर रही हैं, तो मेरे अंदर का वो प्यार और उत्साह धीरे-धीरे एक उलझन में बदलने लगा।
मैंने रिया की तरफ देखा। उसने मेरी नज़रें महसूस कीं और मेज़ के नीचे से अपने पैर से मेरे पैर को हल्का-सा छू लिया। मेरे पूरे शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। ये वही ‘स्लो-बर्न’ था — वो इतने करीब थी, फिर भी मुझसे मीलों दूर। उसकी आँखों में एक अजीब-सी कशमकश थी, एक खामोश गुज़ारिश थी, जैसे वह बिना कुछ कहे कह रही हो, “प्लीज़, आज थोड़ा बर्दाश्त कर लो।”
लेकिन बर्दाश्त करना अब मुश्किल हो रहा था। जब वेटर ने भारी-भरकम बिल मेरे सामने रखा, तो मेरी धड़कनें तेज़ हो गईं। मैंने अपना वॉलेट निकाला और चुपचाप कार्ड थमा दिया। रिया ने या उसकी सहेलियों ने एक बार भी नहीं कहा कि हम बिल बाँट लें। वे बस फोन में सेल्फी लेने में व्यस्त रहीं। मेरी जेब पूरी तरह खाली हो चुकी थी, लेकिन मेरा स्वाभिमान मुझे कुछ कहने नहीं दे रहा था।
कैफे से बाहर निकलते हुए, जब हम भीड़ में एक पल के लिए पीछे छूट गए, तो रिया ने अचानक मेरे करीब आकर फुसफुसाते हुए कहा, “आज के लिए थैंक्स… अगली बार हम कोशिश करेंगे कि अकेले मिलें।” उसकी साँसों की गर्माहट मेरी गर्दन पर महसूस हुई, और उस एक पल के स्पर्श ने मेरी सारी शिकायतें धुंधला कर दीं।
लेकिन उस रात जब मैं अपने कमरे में लेटा था, तो छत को घूरते हुए मेरे दिमाग में बस एक ही सवाल बार-बार गूँज रहा था — क्या वो सच में मजबूर थी, या मैं किसी खेल का मोहरा बन रहा था? मेरे पास अगली डेट के लिए अब पैसे नहीं बचे थे, लेकिन उसकी वो छुअन मुझे एक अलग ही आग में जला रही थी।
भाग 2: दूसरी मुलाकात, वही दीवार और सुलगती आग
मेरा नाम कबीर है। उस पहली मुलाकात के बाद के तीन दिन मेरे लिए किसी सज़ा से कम नहीं थे। रिया की वो आखिरी फुसफुसाहट, उसकी साँसों की वो गर्माहट जो मेरी गर्दन पर ठहर गई थी… वो सब मुझे पागल किए जा रहा था। मेरे बैंक अकाउंट का खालीपन मुझे चिढ़ा रहा था, लेकिन मेरी रगों में दौड़ती रिया की चाहत उस पर भारी पड़ रही थी।
मैंने तय कर लिया कि इस बार कोई बेवकूफी नहीं करूँगा। मैंने उसे मैसेज किया, “कल शाम मेहताब बाग चलें? ताज के पीछे डूबते सूरज को देखना बहुत सुकून देता है।” यह मेरी एक सोची-समझी चाल थी। मेहताब बाग में टिकट के अलावा कोई बड़ा खर्च नहीं था, और वहाँ की खुली हवा और पेड़-पौधों के बीच शायद मुझे रिया के साथ कुछ अकेले पल मिल जाते।
उसका रिप्लाई तुरंत आया, “Sounds perfect! श्रुति और मान्या भी ताज देखने के लिए एक्साइटेड हैं।”
मैसेज पढ़ते ही मैंने फोन बिस्तर पर पटक दिया। फिर से वही दो सहेलियाँ! मेरी मुट्ठियाँ भिंच गईं। लेकिन मैंने खुद को शांत किया। इस बार मैं तैयार था।
अगली शाम, हल्की हवा चल रही थी। रिया ने एक काली कुर्ती पहनी थी, जो उसके बदन से बिल्कुल चिपकी हुई थी। उसके बाल खुले थे और उसकी परफ्यूम की वो मीठी, नशीली महक मेरे होश उड़ाने के लिए काफी थी। मैं उसे बस देखता ही रह गया। श्रुति और मान्या भी साथ थीं, हमेशा की तरह चहकती हुईं, लेकिन मेरी आँखों में सिर्फ रिया थी।
हम बाग में टहलने लगे। मैंने जान-बूझकर तेज़ चलना शुरू किया ताकि वो दोनों पीछे रह जाएँ। एक संकरे रास्ते पर, जहाँ पेड़ों की घनी छाँव थी, मैंने अचानक रुककर रिया का हाथ पकड़ लिया और उसे हल्के से अपनी तरफ खींच लिया।
वो एकदम से मेरे सीने से आ टकराई। मेरी धड़कनें बेतहाशा दौड़ रही थीं और मैं महसूस कर सकता था कि उसकी साँसें भी तेज़ हो गई थीं। “तुमने कहा था अगली बार हम अकेले मिलेंगे,” मैंने उसकी गहरी आँखों में देखते हुए धीमी, लेकिन भारी आवाज़ में कहा। मेरी पकड़ उसकी कमर के पास थोड़ी सख्त हो गई।
रिया ने कोई विरोध नहीं किया। बल्कि, वो मेरे और करीब आ गई। उसने अपने होंठों को हल्का-सा काटा और मेरी आँखों में देखते हुए फुसफुसाई, “मैं क्या करूँ कबीर… वो दोनों मेरे पीछे ही पड़ी रहती हैं। लेकिन…”
“लेकिन क्या?” मैंने अपना चेहरा उसके चेहरे के इतने करीब कर लिया कि हमारे होंठों के बीच सिर्फ कुछ इंच का फासला रह गया।
उसने अपनी उँगलियाँ मेरे सीने पर रखीं, जिससे मेरे पूरे शरीर में एक करंट-सा दौड़ गया। “लेकिन मुझे भी तुम्हारे साथ ऐसे ही अकेले रहना अच्छा लग रहा है,” उसने लगभग काँपती हुई आवाज़ में कहा।
तभी पीछे से मान्या की तेज़ आवाज़ आई, “अरे रिया, तुम लोग कहाँ रह गए? यहाँ आओ, सेल्फी लेते हैं!”
वो पल, वो जादू झटके से टूट गया। रिया ने मुझे एक आखिरी, कसक भरी नज़र से देखा और खुद को मुझसे छुड़ाकर उनकी तरफ चली गई। मैं वहीं खड़ा रह गया, अपनी अधूरी ख्वाहिशों की उस आग में जलता हुआ, जो अब पहले से कहीं ज़्यादा भड़क चुकी थी। मुझे एहसास हो गया था कि रिया भी वही चाहती है जो मैं चाहता हूँ, बस बीच में ये सहेलियाँ एक काँटा बनी हुई थीं। और अब, मुझे इस काँटे को निकालने का कोई पक्का इंतज़ाम करना ही था।