भाग 1: सेज की राख और सुलगते सवाल
बड़े-बड़े घरों के दालानों में जब कोई ज़िद जड़ पकड़ लेती है, तो फिर किसी की नहीं चलती। सुमित्रा देवी की ज़िद थी कि इस हवेली में अब बहू के पायलों की झंकार गूँजनी चाहिए। उनका इकलौता बेटा अजय हमेशा किसी न किसी बहाने से शादी की बात टालता रहता था, लेकिन आखिरकार माँ की भावुक ब्लैकमेलिंग के आगे उसे घुटने टेकने पड़े।
और इस तरह एक भव्य समारोह के बीच अंजलि इस विशाल हवेली की बहू बनकर आ गई।
अंजलि अभी इक्कीस साल की उम्र में ही थी। वह कोई संगमरमर की तराशी हुई मूर्ति नहीं थी, मगर उसके अस्तित्व में एक ऐसी अनोखी खिंचाव थी जो किसी को भी पल भर में बाँध ले। उसने अपने यौवन को बड़े संभालकर रखा था। वह ठीक उस उम्र में थी जहाँ कोई लड़की अपने शरीर में हो रहे बदलावों को महसूस करती है, आईने के सामने खड़े होकर अपनी ही काया के निखार पर शर्माती है और उस एक पुरुष की कल्पना करती है जो उसके इस समर्पण का हकदार बने। अंजलि अच्छी तरह जानती थी कि उसके रूप का वह कसाव, वह उभार किसी भी पुरुष की नज़रों को ठहरा देने के लिए काफी है।
सुहागरात वाला कमरा फूलों की महक से ज़्यादा एक अजीब-सी खामोशी से भरा हुआ था। भारी ज़री के लहंगे में सिमटी अंजलि बिस्तर के बीचों-बीच बैठी थी। आज उसने ठान लिया था कि वह अपनी सारी झिझक, सारी वर्जनाएँ इस बंद दरवाज़े के बाहर छोड़ आएगी। आज वह सिर्फ एक औरत थी, जो अपने पूरे अस्तित्व को अपने पति के हवाले कर देना चाहती थी। वह उस प्यार की, उस आग की तपिश महसूस करना चाहती थी जिसके सपने उसने अनगिनत रातों में देखे थे।
दरवाज़ा खुला और अजय अंदर आया।
अंजलि की नज़रें झुकी हुई थीं, लेकिन वह अजय के भारी कदमों की आहट साफ़ महसूस कर रही थी। अजय के मन में सुहागरात की वह स्वाभाविक बेताबी नहीं थी; उसके भीतर एक गहरा खौफ पल रहा था। दोस्तों की नसीहतें और रात के लिए ली गई कुछ गोलियों की गर्मी ने उसके दिमाग पर एक नशा-सा छा दिया था। उसे लगा कि शायद आज वह अपनी उस सच्चाई को, उस नामर्दी के डर को पीछे छोड़ देगा जो उसे अंदर से खोखला कर रही थी।
अजय ने बिना कुछ कहे अंजलि के पास आकर उसका घूँघट उठा दिया। अंजलि ने पलकें उठाईं। उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में एक गहरा निमंत्रण था, एक पूरा समर्पण था। लेकिन अजय की आँखों में प्यार नहीं, बल्कि एक अजीब-सी जल्दबाज़ी थी। उसने बिना उन पलों को जीए, बिना अंजलि की धड़कनों को महसूस किए, उसे अपनी बाहों में जकड़ लिया।
अंजलि इस अचानक और रूखे स्पर्श से थोड़ी सकपका गई, लेकिन उसने इसे अपने पति का हक समझकर आँखें मूँद लीं। अजय की उँगलियाँ जल्दबाज़ी में अंजलि के भारी ब्लाउज़ की डोरियों से उलझ रही थीं। कुछ ही पलों में वह आवरण हट गया। लाल रंग की बेहद कसी हुई ब्रा में अंजलि के यौवन का वह कसाव देखकर अजय की साँसें तेज़ हो गईं।
अंजलि ने शर्म से आँखें बंद करते हुए करवट ली और उल्टी लेट गई, जिससे उसकी पूरी नंगी, मखमली पीठ अजय के सामने आ गई। उस गोरी, दमकती पीठ को देखकर अजय के अंदर ली गई गोलियों का वह कृत्रिम उबाल अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया। उसने अपने काँपते हाथ अंजलि की उस गर्म पीठ पर रखे। अंजलि के मुँह से एक हल्की, अनजानी-सी आह निकल गई। उस आह में एक स्त्री की बरसों की तड़प थी।
लेकिन वह तड़प बस तड़प ही रह गई।
अजय ने जैसे ही अंजलि को अपनी ओर मोड़ा और उस दहकते बदन की गर्माहट को करीब से महसूस किया, उसके अंदर का सारा कृत्रिम तूफान ताश के पत्तों की तरह बिखर गया। इससे पहले कि वह प्यार की उस नदी में उतर पाता, उसका शरीर पूरी तरह शिथिल पड़ गया। वासना का वह उफान जो दवाइयों के सहारे उठा था, चंद पलों में ही राख हो गया।
अजय बुरी तरह हाँफते हुए अंजलि से दूर गिर पड़ा। उसके माथे पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं और वह नज़रें चुराकर बिस्तर के दूसरे कोने में सिमट गया।
कमरे में एक भयानक, चुभने वाला सन्नाटा फैल गया। अंजलि अपनी जगह सुन्न रह गई। जो आग अभी-अभी उसके भीतर सुलगना शुरू हुई थी, वह एक झटके में बर्फ हो गई थी। उसने अजय की पीठ को देखा, जो अब उससे मीलों दूर लग रही थी। उसके अरमानों की सेज पहली ही रात में चिता जैसी लगने लगी थी।
आने वाले कई दिन इसी घुटन में गुज़रे। अजय अब अंजलि की तरफ देखना भी बंद कर चुका था। रात को वह तब कमरे में आता जब अंजलि सो जाने का नाटक कर रही होती। एक जवान, खूबसूरत लड़की हर रात अपने ही रूप को आईने में देखकर घुटती रहती। क्या कमी है मुझमें? क्या मैं उसे आकर्षित नहीं करती? ये सवाल उसे अंदर ही अंदर काट रहे थे।
आखिरकार, एक रात अंजलि के सब्र का बाँध टूट गया। उसने रोते हुए अजय से जवाब माँगा। और उस रात अजय ने घुटने टेक दिए। सिसकते हुए उसने वो सच उगल दिया — कि वह एक पुरुष के रूप में अक्षम है, कि वह कभी अंजलि की उन ज़रूरतों को पूरा नहीं कर सकता जिनका सपना देखकर वह इस घर में आई थी।
अंजलि के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। एक ऐसा रिश्ता जिसकी बुनियाद ही झूठ और धोखे पर टिकी थी, उसमें वह अपनी पूरी ज़िंदगी कैसे गुज़ार सकती थी? वह कोई पुराने ज़माने की अबला नहीं थी। उसी पल उसने तय कर लिया कि वह इस घुटन भरे पिंजरे को तोड़ देगी।
अगले ही दिन उसने भरे घर में ऐलान कर दिया कि उसे अजय से तलाक चाहिए।
भाग 2: एक वर्जित प्रस्ताव और सुलगती हुई प्यास
हवेली के उस विशाल ड्राइंग रूम में जैसे किसी ने मौत की खबर सुना दी हो। अंजलि के मुँह से निकला ‘तलाक’ शब्द उन ऊँची छतों से टकराकर एक भयानक सन्नाटे में बदल गया था। सुमित्रा देवी, जिनका पूरा वजूद इस समाज में अपने रुतबे और खानदान की इज़्ज़त पर टिका था, बुरी तरह काँप उठी थीं। कल तक जो सासू माँ रौब से पूरे घर पर हुकूमत करती थीं, आज उनकी आँखों में अपनी बहू के लिए एक बेबस गिड़गिड़ाहट थी।
अजय एक कोने में सिर झुकाए खड़ा था। उसका पुरुषार्थ तो उसी रात दम तोड़ चुका था, और आज उसका स्वाभिमान भी इस चौखट पर नीलाम हो रहा था। अंजलि के लिए यह फैसला आसान नहीं था, लेकिन एक इक्कीस साल की छलकते यौवन वाली लड़की, जिसके बदन के पोर-पोर में एक मर्द के प्यार और छुअन की प्यास भड़क रही हो, वह महज़ एक झूठे रिश्ते की वेदी पर खुद को राख कैसे कर सकती थी?
दो दिन इसी घुटन में बीत गए। हवेली में सब एक-दूसरे से नज़रें चुरा रहे थे। फिर एक दोपहर, जब अजय और राघवेंद्र किसी काम से बाहर गए हुए थे, सुमित्रा ने अंजलि को अपने कमरे में बुलाया।
कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद कर दिया गया। हवा में एक अजीब-सी भारीपन और सीलन थी। सुमित्रा ने अंजलि के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। उनके हाथ बर्फ की तरह ठंडे थे, लेकिन उनकी आँखों में एक खौफनाक आग जल रही थी।
“अंजलि… मैं जानती हूँ मेरे बेटे ने तुम्हारी ज़िंदगी के सबसे खूबसूरत सपने को पैरों तले रौंद दिया है,” सुमित्रा की आवाज़ फुसफुसाहट जैसी थी, पर हर शब्द हथौड़े की तरह पड़ रहा था। “पर अगर तुम इस घर से गई, तो लोग हमारे परिवार की धज्जियाँ उड़ा देंगे। मेरी गलती है… मैं मानती हूँ। पर मैं तुम्हें इस घर से जाने नहीं दूँगी। तुम्हारी जो भी ज़रूरतें हैं, जो हक तुम्हें इस उम्र में चाहिए… उसका इंतज़ाम मैं करूँगी।”
अंजलि की त्योरियाँ चढ़ गईं। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसकी सास क्या कहना चाह रही है। “इंतज़ाम? कैसा इंतज़ाम मम्मी जी? क्या किसी डॉक्टर से…”
“नहीं बहू,” सुमित्रा ने बात काटी, और फिर कुछ ऐसा कहा जिसने अंजलि के पैरों तले ज़मीन खिसका दी। “जो सुख मेरा बेटा तुम्हें नहीं दे सका… उसके लिए… मैं अपना पति तुम्हें देती हूँ।”
कमरे में मानो बिजली गिर गई। अंजलि झटके से पीछे हटी, जैसे किसी ने उसे आग से दाग दिया हो। “ये आप क्या कह रही हैं? आपका दिमाग तो ठिकाने पर है? वो मेरे ससुर हैं!”
“समाज के लिए हैं अंजलि,” सुमित्रा बिना पलक झपकाए बोली। “लेकिन बंद दरवाज़ों के पीछे जिस्म की जो आग होती है, वो रिश्ते नहीं देखती। तुम्हारे ससुर, राघवेंद्र, बावन साल के हैं, पर सेना की वो कड़क ट्रेनिंग उनके खून में दौड़ती है। उनका बदन आज भी किसी फौलाद से कम नहीं है। एक औरत के जिस्म को कैसे तृप्त किया जाता है, वो बहुत अच्छी तरह जानते हैं। वो तुम्हें उस चरम सुख तक ले जा सकते हैं, जिसके लिए तुम हर रात उस ठंडे बिस्तर पर तड़पती हो।”
अंजलि का गला सूख गया था। उसका दिल पसलियों को तोड़कर बाहर आने को हो रहा था।
“और अगर तुम्हें उनसे झिझक है,” सुमित्रा ने अपना आखिरी दाँव चला, “तो विक्रम है। तुम्हारा देवर। तुम्हारे ही उम्र का है। जवान है, खून गर्म है। हाँ, थोड़ा अनुभवहीन ज़रूर है, लेकिन उसकी जवानी तुम्हारी हर प्यास बुझा देगी। आखिर पुराने ज़माने में भी तो देवर को दूसरा पति माना जाता था।”
“चुप रहिए आप! मुझे घिन आ रही है ये सब सुनकर,” अंजलि अपना आँचल संभालती हुई तेज़ी से बाहर भाग गई।
वह अपने कमरे में आकर बिस्तर पर गिर पड़ी। उसका पूरा शरीर काँप रहा था। एक तरफ इस घिनौने प्रस्ताव की उलझन थी, और दूसरी तरफ… दूसरी तरफ उसके अपने ही बदन की वो बगावत थी, जिसे अजय ने अधर में छोड़ दिया था। अंजलि खुद से नफरत करना चाह रही थी, पर जब इंसान प्यासा होता है, तो वह यह नहीं देखता कि पानी किस बर्तन में है। सुमित्रा के वो शब्द — ‘फौलाद जैसा बदन’, ‘औरत को तृप्त करना’ — किसी मीठे ज़हर की तरह उसके दिमाग की नसों में उतर रहे थे।
अगली सुबह। शिमला की सर्द हवाओं ने हवेली को अपनी आगोश में ले रखा था। अंजलि पूरी रात सो नहीं पाई थी। उसकी आँखों के नीचे हल्के काले घेरे आ गए थे। वह एक पतली-सी शॉल ओढ़े बालकनी में खड़ी थी। तभी उसकी नज़र नीचे बगीचे में गई।
कोहरे को चीरती हुई सूरज की हल्की किरणें बगीचे में पड़ रही थीं, और वहीं… राघवेंद्र व्यायाम कर रहे थे। इतनी कड़ाके की ठंड में भी उनके शरीर पर सिर्फ एक सूती शॉर्ट्स और एक कसी हुई सैंडो बनियान थी। अंजलि चाहकर भी अपनी नज़रें हटा नहीं पा रही थी।
राघवेंद्र के चौड़े कंधे, उनके सीने का वो भारीपन जो बनियान से साफ़ झलक रहा था, और उनके बाइसेप्स की उभरती हुई नसें। जब वो डम्बल उठा रहे थे, तो उनके शरीर का एक-एक कट उभरकर सामने आ रहा था। पसीने की कुछ बूँदें उनकी गर्दन से फिसलकर उनके सीने के बालों में खो रही थीं।
अंजलि के अंदर जो औरत पिछले कई दिनों से कुचली जा रही थी, वह अचानक करवट लेने लगी। उसकी साँसें भारी हो गईं। उसकी नज़रें राघवेंद्र की उन मजबूत बाहों पर टिक गईं। मन के किसी गहरे, अँधेरे और वर्जित कोने से एक आवाज़ उठी — ‘अगर ये बाहें मुझे अपनी आगोश में जकड़ लें… अगर इस चौड़े सीने की गर्माहट मेरे इस ठंडे पड़ चुके बदन को मिल जाए… तो कैसा होगा?’
“छी!” अंजलि ने अपने होंठ दाँतों तले दबा लिए। वह खुद पर झल्ला उठी। एक पल के लिए उसे लगा कि वह सच में पागल हो रही है। अपनी ही वासना और अतृप्ति उसे एक ऐसा खेल खिला रही थी, जिसके अंजाम के बारे में सोचना भी पाप था।
घबराहट, शर्म और अपनी ही सुलगती हुई प्यास से डरकर, उसने कमरे में आकर काँपते हाथों से अपनी सबसे करीबी सहेली और चचेरी बहन नेहा को फोन मिलाया। उसे किसी ऐसे इंसान की ज़रूरत थी जो उसे इस दलदल से बाहर निकाल सके।
“हैलो… नेहा…” अंजलि की आवाज़ रुलाई और हवस के उस अजीब-से भंवर में फंसी हुई थी।
“अंजलि? क्या हुआ? सुबह-सुबह… सब ठीक तो है ना?” नेहा जो नींद में थी, अंजलि की आवाज़ सुनते ही उठ बैठी।
“कुछ भी ठीक नहीं है नेहा… मैं यहाँ घुट रही हूँ। अजय… अजय कभी मेरा पति नहीं बन सकता। वो… वो नामर्द है।” अंजलि के आँसू बह निकले।
दूसरी तरफ एक लंबा सन्नाटा छा गया। “हे भगवान… अंजलि… ये तू क्या कह रही है?”
“और इससे भी भयानक बात बताऊँ तुझे?” अंजलि की आवाज़ अब एक सिहरन में बदल गई थी। “मेरी सास ने कल मुझे अपने कमरे में बुलाया था… और मुझसे कहा कि मैं अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए… अपने ससुर या देवर के साथ हमबिस्तर हो जाऊँ।”
नेहा के मुँह से एक हल्की-सी चीख निकल गई। “क्या बकवास है ये! वो औरत पागल हो गई है क्या?”
“मैं भी यही सोच रही थी नेहा… पर आज सुबह…” अंजलि बोलते-बोलते रुक गई। उसकी जाँघों के बीच एक अजीब-सी गर्मी और सिहरन दौड़ रही थी, जिसे वह चाहकर भी नकार नहीं पा रही थी।
“पर आज सुबह क्या अंजलि? बोल ना…”