बेदाग हुस्न और दागदार शराफत का खेल.

भाग 1: अनजान रास्ते और वो पहली छुअन

मेरा नाम नितिन है। अगर कोई मुझसे मेरा स्वभाव पूछे तो शायद मेरे पास कोई खास या रोचक जवाब नहीं होगा। मैं बचपन से ही उन लड़कों में शामिल रहा हूँ जो अपनी छोटी-सी दुनिया में खुद को समेटकर रहते हैं। मेरा दायरा हमेशा सीमित रहा—मुश्किल से एक-दो दोस्त, जिनसे साल में शायद एक-आध बार ही बात होती थी। मेरी ज़िंदगी का सरल सा सिद्धांत था: अपने काम में लगा रहना और चुपचाप अपना समय बिताना।

बचपन से लेकर दसवीं तक मेरी पूरी दुनिया मेरे माता-पिता, मेरे छोटे भाई और किराए के एक छोटे से घर के इर्द-गिर्द घूमती थी। मैं एक लड़कों वाले स्कूल में पढ़ता था। ट्यूशन में लड़कियाँ आती थीं, मगर उस उम्र और उस दौर में माता-पिता व टीचर्स का ऐसा डर था कि मैंने कभी किसी लड़की से बात करने की हिम्मत नहीं की। सच कहूँ तो हिम्मत ही नहीं जुटा पाया।

दसवीं में जब मेरे 90% नंबर आए तो घर में खुशी की लहर दौड़ गई। उसी साल पापा ने अपनी सारी जमा-पूँजी लगाकर अपना घर खरीद लिया। वो घर मेरे पुराने स्कूल से काफी दूर था। यात्रा की थकान और दूरी को देखते हुए माता-पिता ने फैसला किया कि 11वीं के लिए मेरा एडमिशन घर के पास वाले किसी अच्छे स्कूल में करवा दें। नंबर अच्छे थे, इसलिए एडमिशन आसानी से हो गया। लेकिन मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती कुछ और थी—यह नया स्कूल को-एड था, जहाँ लड़के और लड़कियाँ साथ-साथ पढ़ते थे। मेरी अब तक की शांत और एकांतप्रिय ज़िंदगी में यह एक बड़ा धक्का था।

नए स्कूल का पहला दिन था और मेरी किस्मत ने मुझे पहले ही दिन लेट कर दिया।

जब मैं थोड़ी घबराहट के साथ क्लासरूम के दरवाज़े पर पहुँचा और अंदर घुसा, तो मेरी नज़रें तेज़ी से खाली जगह तलाशने लगीं। क्लास पूरी तरह भरी हुई थी। सिर्फ एक सीट खाली थी और वह भी एक लड़की की ठीक पीछे वाली बेंच पर। मेरे पास कोई और चारा नहीं था। मैं चुपके से गया और अपनी जगह पर बैठ गया। तय हो चुका था कि 11वीं का पूरा साल मुझे इसी सीट पर गुज़ारना है।

मैंने किताबें निकालीं और बोर्ड पर लिखे नोट्स उतारने की तैयारी करने लगा। तभी मेरा ध्यान आगे बैठी उस लड़की पर चला गया। उसके बाल बेहद खूबसूरत और लंबे थे। उन्हें खुला छोड़ा हुआ था और वे बाल उसकी पीठ से होते हुए मेरी डेस्क तक पहुँच रहे थे। क्लास के पंखे की हवा से उसके बालों की कुछ लटें बार-बार मेरी कॉपी पर गिर जाती थीं।

नोट्स लिखने में दिक्कत हो रही थी, लेकिन असली समस्या बालों की नहीं थी। असली समस्या यह थी कि मैं उसे यह बात कैसे बताऊँ? मैंने आज तक किसी लड़की से सीधे बात नहीं की थी। मेरे अंदर इतनी हिम्मत ही नहीं थी कि उसे पुकार सकूँ। मैं कुछ देर उलझन में बैठा रहा।

आखिरकार, जब नोट्स छूटने लगे तो मैंने हिम्मत करके अपनी कलम के पिछले हिस्से से उसके बालों को हल्का-सा हटाने की कोशिश की।

लेकिन मेरी किस्मत… उसे तुरंत पता चल गया।

उसने अचानक पीछे मुड़कर देखा। उसके चेहरे पर हल्की नाराज़गी थी और आँखों में सवाल। “क्या कर रहे हो?” उसने तीखे स्वर में पूछा।

मेरी साँस जैसे रुक गई। लगा जैसे मैंने कोई बड़ा अपराध कर दिया हो। मैं घबराकर लड़खड़ाती आवाज़ में बोला, “वो… तुम्हारे बाल मेरी कॉपी पर आ रहे थे… लिखने में मुश्किल हो रही थी, इसलिए…”

मैं सफाई दे ही रहा था कि अचानक उसके चेहरे के भाव बदल गए। नाराज़गी पल भर में गायब हो गई और उसने बात समझ ली। बिना कुछ कहे उसने अपने बाल समेटकर आगे की तरफ कर दिए। मुझे लगा जैसे मेरे सिर से भारी बोझ उतर गया हो।

मैं अभी राहत की साँस ले ही रहा था कि वह अचानक अपनी सीट पर थोड़ा मुड़ी। उसने मेरी तरफ देखा। उसके चेहरे पर एक बेहद प्यारी और निर्भीक मुस्कान थी। उसने अपना दाहिना हाथ मेरी तरफ बढ़ाया और मीठे स्वर में बोली, “हाय! मेरा नाम पलक है। आज मेरा इस स्कूल में पहला दिन है।”

मैं एक पल के लिए स्तब्ध रह गया। समझ नहीं आया कि क्या करूँ। मेरे काँपते हाथों ने धीरे से उसका हाथ थाम लिया। “मेरा… मेरा नाम नितिन है,” मैंने किसी तरह शब्द निकाले।

जैसे ही हमारे हाथ मिले, मेरे पूरे शरीर में एक अजीब-सी सिहरन दौड़ गई, जैसे हल्का-सा करंट लग गया हो। यह मेरी ज़िंदगी में पहली बार था जब मैंने किसी लड़की का हाथ इस तरह छुआ था। उसकी हथेली की गर्माहट, उसकी बेझिझक मुस्कान और आँखों की चमक—सब मेरे लिए एक नई दुनिया थी।

हमारा हाथ शायद कुछ सेकंड ही मिला था, लेकिन मेरे लिए वह पल जैसे ठहर गया था। उस दिन, उस एक क्षण में मेरी शांत और खामोश दुनिया हमेशा के लिए बदल गई। पलक के साथ यह सिर्फ दोस्ती की शुरुआत नहीं थी, बल्कि एक अनजाने सफर का पहला कदम था, जिसके बारे में मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था।

भाग 2: ट्यूशन क्लास और वो अनकही धड़कनें .

स्कूल में पलक से हुई उस पहली मुलाकात के बाद मेरी रोज़मर्रा की ज़िंदगी पूरी तरह बदल गई थी। मैं बाहर से वही चुप और कम बोलने वाला नितिन था, लेकिन अंदर एक अनोखी हलचल शुरू हो गई थी। स्कूल में पलक मुझसे बात करने की कोशिश करती, अपनी बातों से मुझे हँसाने की कोशिश करती। 

कभी-कभी वह जान-बूझकर बाल झटकती और मुझे लगता जैसे वह मुझे अपनी तरफ खींचने, उकसाने के लिए ऐसा कर रही है। उस दौर में जहाँ लड़के-लड़कियों का आपस में बात करना भी बड़ी बात माना जाता था, पलक का यह निर्भीकपन मेरे लिए बिल्कुल नया और हैरतअंगेज़ अनुभव था।

स्कूल की यूनिफॉर्म में तो सब कुछ सीमित लगता था, लेकिन मेरी ज़िंदगी का असली तूफान तब आया जब मैंने उसे अपनी ट्यूशन क्लास में देखा।

ट्यूशन क्लास एक छोटे से कमरे में होती थी, जहाँ अनुशासन बहुत सख्त था। मैं हमेशा की तरह चुपचाप अपनी जगह पर बैठा था। तभी दरवाज़े से पलक अंदर आई। उसे देखते ही मेरी धड़कनें इतनी तेज़ हो गईं कि लगा आस-पास बैठे सबको आवाज़ सुनाई दे रही होगी।

उस दिन उसने स्कूल की साधारण यूनिफॉर्म नहीं पहनी थी। उसने स्लीवलेस टी-शर्ट और फिटिंग वाली कैप्री पहनी हुई थी। ट्यूशन में दूसरी लड़कियाँ भी आती थीं—कोई सूट में, कोई ढीली जींस-टी-शर्ट में—लेकिन मैंने आज तक किसी लड़की को इतने करीब से ऐसे कपड़ों में नहीं देखा था।

मेरी नज़रें जैसे उस पर जमी रह गईं। चाहकर भी हटा नहीं पा रहा था। उसकी स्लीवलेस टी-शर्ट इतनी टाइट थी कि उसकी छोटी-छोटी गोल छातियाँ साफ़ उभरी हुई दिख रही थीं और निप्पल्स की हल्की-हल्की उभरी हुई आउटलाइन कपड़े के ऊपर से भी साफ़ नज़र आ रही थी। कैप्री उसकी पतली कमर, गोल-मटोल जाँघों और मोटी, नाजुक नितम्ब पर इतनी कसकर चिपकी थी कि हर कदम पर उसकी जाँघों की मांसलता और नितम्ब की गोलाई हिल रही थी।

मुझे और भी हैरानी तब हुई जब उसने मेरे ठीक आगे वाली सीट पर बैठी लड़की से कुछ कहा, उसे दूसरी जगह भेज दिया और खुद मेरे ठीक सामने आकर बैठ गई। मुझे यकीन हो गया कि यह जान-बूझकर किया था।

जब वह मेरे आगे बैठी, तो टी-शर्ट की छोटी लंबाई की वजह से पीछे से उसकी पतली कमर की झलक दिख रही थी। मेरे अंदर घबराहट और सिहरन की लहर दौड़ रही थी। हाथ-पैर ठंडे पड़ रहे थे।

मैं अपनी नज़रें किताब पर गड़ाए रखने की कोशिश कर रहा था, लेकिन मेरा पूरा ध्यान उसी पर था। उसकी कमर की चिकनी गोरी त्वचा, पतले पेट की हल्की लकीर और नितम्ब की निचली गोलाई जो कैप्री से भी साफ़ दिख रही थी—सब कुछ मेरे औजार को धीरे-धीरे सख्त बना रहा था।

तभी फिर वही हुआ—उसके लंबे खूबसूरत बाल मेरी डेस्क पर गिर गए।

मैंने गहरी साँस ली और काँपती आवाज़ में कहा, “पलक… तुम्हारे बाल… इन्हें आगे कर लो।”

लेकिन इस बार उसने सिर्फ मुड़कर बाल आगे नहीं किए। वह अचानक खड़ी हो गई। मेरी तरफ देखा, हल्की मुस्कान के साथ दोनों हाथ ऊपर उठाए और बाल समेटकर बाँधने लगी।

वो पल… वो कुछ सेकंड मेरी ज़िंदगी के सबसे खूबसूरत और होश उड़ा देने वाले पल थे।

जैसे ही उसने हाथ ऊपर किए, उसकी स्लीवलेस टी-शर्ट और ऊपर खिसक गई। मेरी नज़रें उसकी गहरी नाभि और उस बेदाग गोरी त्वचा पर पड़ गईं। हाथ ऊपर होने से उसके कंधों की बनावट, बाहों के नीचे का नाजुक हिस्सा सब मेरे सामने था। टी-शर्ट ऊपर खिसकने से उसकी दोनों छातियाँ पूरी तरह उभर आई थीं—छोटी लेकिन बेहद गोल, टाइट, और निप्पल्स सख्त होकर कपड़े पर दो छोटे उभार बना रहे थे।

उसकी नाभि गहरी और गोल थी, उसके अंदर हल्का पसीना चमक रहा था। कमर की चिकनी त्वचा इतनी मुलायम लग रही थी कि उसे चाटने का ख़याल भर से मैं पागल हो गया। बाहों के नीचे का गोरा नाजुक मांस और पसीने की हल्की नमी—सब कुछ मेरी आँखों के ठीक सामने था। मैंने ज़िंदगी में पहली बार किसी लड़की के जिस्म की इस खूबसूरती को इतने करीब से, इतनी बारीकी से देखा था।

मेरे अंदर एक ऐसी आग, एक ऐसा आकर्षण जाग रहा था जिसके बारे में मैंने सिर्फ किताबों में पढ़ा या दोस्तों से छुप-छुपकर सुना था। गला सूख रहा था और मुँह से कोई शब्द नहीं निकल रहा था। मेरा औजार अब पूरी तरह सख्त होकर पैंट के अंदर तन गया था और हल्का-हल्का दर्द कर रहा था।

बाल बाँधते हुए अचानक उसकी नज़र मेरी आँखों से टकराई। उसने मुझे इस तरह एकटक घूरते पकड़ लिया।

“क्या देख रहे हो?” उसने शरारती चमक भरी आँखों से पूछा।

मैं बुरी तरह घबरा गया। चेहरा शर्म और झिझक से लाल हो गया। मैंने हड़बड़ाकर भाव छुपाने की कोशिश की और लड़खड़ाती आवाज़ में बोला, “कु… कुछ नहीं… बस ऐसे ही।”

लेकिन उसकी मुस्कान बता रही थी कि वह सब समझ गई थी। वह जानती थी कि मैं क्या देख रहा था और मेरे अंदर क्या उथल-पुथल मची हुई थी। वह जानती थी कि मेरा औजार उसके जिस्म को देखकर कितना सख्त और कितना गीला हो गया है।

उस दिन ट्यूशन के बाद मैं घर कैसे पहुँचा, कुछ याद नहीं। उस रात मैं ठीक से सो नहीं पाया। करवटें बदलते हुए मेरी आँखों के सामने सिर्फ पलक का अक्स घूम रहा था। उसके उठे हुए हाथ, वो स्लीवलेस टी-शर्ट, उसकी गहरी नाभि और मुझे देखकर उसकी वो शरारती मुस्कान।

मेरे ख़यालों में एक अजीब-सी कशमकश थी, एक ऐसा नशा था जिसने मुझे पूरी तरह जकड़ लिया था। उस रात पहली बार एहसास हुआ कि मैं अब सिर्फ एक ‘सीधा-सादा लड़का’ नहीं रहा। मेरे अंदर भी एक मर्द जाग रहा था, जो पलक के इस निर्भीक हुस्न का पूरी तरह दीवाना हो चुका था। 

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