यौन आकर्षण और कामुकता की अनुभूति किसी रहस्यमयी, अथाह समुद्र की तरह होती है। यह एक ऐसा प्रचंड और अजेय वेग है, जिसके सामने सदियों से इंसानी सभ्यता, कठोर नियम-कानून और सारी सामाजिक मर्यादाएँ घुटने टेकती आई हैं। हमारे प्राचीन ग्रंथ इस बात के साक्षी हैं कि जब-जब किसी महान तपस्वी ने अपनी इंद्रियों पर विजय पाने का घमंड किया, तब-तब स्वर्ग से उतरी किसी अप्सरा की मादक खुशबू, उसकी पायल की झंकार और यौवन की अनोखी छटा ने उन वर्षों की कठोर तपस्या को पल भर में धूल में मिला दिया। जब सदियों के ज्ञान और तपस्या से सजे मुनि भी इस धधकती आग के सामने मोम की तरह पिघल गए, तो फिर कच्ची उम्र के धड़कते, नादान दिलों की क्या औकात?
यह सोचना कि केवल आज की पीढ़ी ही इस कामुक खिंचाव के आगे बेबस है, बिल्कुल गलत है। आकर्षण, वासना और जिस्मानी प्यास कभी भी समय, उम्र या लिंग की गुलाम नहीं रही। फर्क सिर्फ इतना है कि आज के समय में स्क्रीन के एक स्पर्श पर बंद कमरों के सारे राज़ खुले आम बिखर जाते हैं। आज की पीढ़ी के लिए सब कुछ बेहद आसान और सुलभ है। लेकिन अगर मैं अपने बचपन के दिनों की बात करूँ, तो उस वर्जित दुनिया की सिर्फ एक झलक पाना भी किसी खजाने की तलाश जितना रोमांचकारी और दिल दहला देने वाला होता था।
आज भी मुझे वह तेरहवाँ साल याद है। वह उम्र जब बचपन पीछे छूट रहा था और मेरे अपने शरीर में अनजाने, अनोखे बदलाव आकार ले रहे थे। रातों में अचानक नींद टूट जाती थी और नस-नस में एक अजीब-सी गर्मी दौड़ने लगती थी। उस वक्त न इंटरनेट था, न स्मार्टफोन की यह बेकाबू दुनिया। हमारी कामुक जिज्ञासाओं और शरीर की नई माँगों को समझने का एकमात्र सहारा घर में चुपके-चुपके आने वाली कुछ स्त्री पत्रिकाएँ हुआ करती थीं — जैसे ‘गृहशोभा’। मैं उन पत्रिकाओं के पन्ने चोरी-छिपे, दरवाज़ा बंद करके, ‘व्यक्तिगत समस्याएँ’ वाले कॉलम को बड़े ध्यान से पढ़ती थी।
उन पन्नों पर छपे अनजान लोगों के सवाल मेरे लिए किसी जादू से कम नहीं थे। जैसे कोई औरत पूछती थी — “मेरे पति रात को बिस्तर पर मुखमैथुन (oral intimacy) की माँग करते हैं, क्या यह स्वास्थ्य की दृष्टि से ठीक है?” या कोई पुरुष अपनी उलझन लिखता था — “मेरी शादी होने वाली है, लेकिन मेरी अपनी भाभी के साथ मेरा शारीरिक संबंध बन गया है। अब वह मुझे छोड़ना नहीं चाहती और हर रोज़ उस रिश्ते को जारी रखने का दबाव डालती है।” आज की खुली दुनिया में ये बातें शायद साधारण और फीकी लगें, लेकिन उस कच्ची उम्र में उन कुछ शब्दों को पढ़ते ही मेरे शरीर के हर रोम-रोम में एक सिहरन दौड़ जाती थी। नाभि के नीचे एक मीठा-सा दर्द उठता था, जो मुझे एहसास कराता था कि मेरे अंदर एक औरत जन्म ले रही है।
मैं अपने भीतर उठ रहे इस नए तूफान से अभी रू-ब-रू हो ही रही थी कि एक दिन मेरी क्लास की सबसे शरारती सहेली काव्या ने मुझे राज़ भरी मुस्कान के साथ अपने घर बुलाया। दोपहर का समय था। उसने मेरे कान के पास आकर फुसफुसाते हुए कहा, “मेरे हाथ आज एक ऐसा खजाना लगा है ना… तू देखेगी तो तेरे होश उड़ जाएँगे। आज स्कूल के बाद सीधे मेरे घर आना।”
उसकी रहस्यमयी बात और आँखों की चमक ने मेरी धड़कनों को बेकाबू कर दिया था। स्कूल का वह पूरा दिन जैसे कटने का नाम ही नहीं ले रहा था। घड़ी की सुइयाँ मानो रुक सी गई थीं। छुट्टी की घंटी बजते ही मैं एक अजीब-सी बेचैनी के साथ मम्मी को होमवर्क का बहाना बनाकर सीधे काव्या के घर पहुँच गई।
घर में एक भारी, अजीब-सा सन्नाटा छाया हुआ था। काव्या की मम्मी घर पर नहीं थीं। उस सूनेपन में हमारे दिलों की तेज़ धड़कनें साफ़ सुनाई दे रही थीं। काव्या बिना कुछ बोले मुझे खींचती हुई ऊपर अपने कमरे में ले गई। उसने अंदर से कुंडी चढ़ाई, खिड़कियों के पर्दे गिराए और फिर अपनी लकड़ी की भारी अलमारी के सबसे गहरे कोने से, पुरानी किताबों और कपड़ों के बीच बड़ी सावधानी से छुपाकर रखी एक मैगज़ीन निकाली।
उस मैगज़ीन का नाम था — ‘तृष्णा’। मैं इस नाम को ज़िंदगी भर नहीं भूल सकती। कवर देखते ही मेरी साँसें एक पल के लिए रुक सी गईं। कवर पर एक बेहद खूबसूरत, जवान और बेहद मादक औरत की तस्वीर थी। उसकी लाल रेशमी साड़ी का पल्लू कंधों से खिसककर फर्श को चूम रहा था। अंदर पहनी हुई कसी हुई चोली से उसके गोरे वक्षों का आधा से ज़्यादा हिस्सा पूरी निर्लज्जता से बाहर झाँक रहा था, जैसे वह कपड़े की कैद से आज़ाद होकर छलक जाना चाहते हों। मैगज़ीन के नीचे एक कोने में गहरे काले अक्षरों में लिखा था — ‘सिर्फ वयस्कों के लिए’।
एक अनजानी, तीखी उत्तेजना के जोश में मैंने काव्या के हाथ से वह मैगज़ीन लगभग छीन ली। मेरे हाथ काँप रहे थे। पन्नों से पुरानी स्याही और सीलन की एक अनोखी महक आ रही थी, जो उस पल मुझे किसी नशे की तरह लग रही थी। उसमें कुछ लंबी कहानियाँ थीं और बीच-बीच में स्त्री-पुरुष के मिलन, उनकी वासना और अंतरंग शारीरिक अवस्थाओं को दिखाते हुए बेहद कामुक रेखाचित्र बने हुए थे।
“काव्या… यार… ये सब तुझे कहाँ से मिला? अगर किसी ने देख लिया तो हमारी क्या हालत होगी? देख तो सही, इसमें कैसे-कैसे चित्र बने हैं,” मेरी आवाज़ में डर कम और एक अजीब-सा सुरूर ज़्यादा था।
“पापा के एक दोस्त दो दिन के लिए यहाँ वाले कमरे में रुके थे। शायद वो इसे गद्दे के नीचे ही भूल गए। मम्मी ने सफाई करने भेजा तो मेरे हाथ लग गई,” काव्या ने होंठ चबाते हुए शरारत से आँख मारी, “तो क्या कहती है? दरवाज़ा तो बंद है… पढ़ें इसे?”
हम दोनों ने एक-दूसरे को देखा और बिना कुछ कहे बिस्तर पर पेट के बल लेट गईं। उस दिन मेरी आँखें उन पन्नों को सिर्फ पढ़ नहीं रही थीं, बल्कि उन्हें पी रही थीं। मेरा दिमाग किसी कैमरे की तरह उन पन्नों, उन रेखाचित्रों और उन शब्दों को अपने अंदर हमेशा के लिए कैद कर रहा था। उस मैगज़ीन की भाषा में एक गहरी मादकता थी। उसमें कोई सस्ता फूहड़पन नहीं था, बल्कि एक साहित्यिक और गहरी कशिश थी जो सीधे रूह और जिस्म दोनों को झकझोर रही थी। आजकल इंटरनेट पर मिलने वाली साधारण कहानियों से वो कहीं ज़्यादा गहरी और असरदार थी।
पहली कहानी एक सुहागरात की थी। आज भी जब मैं आँखें बंद करती हूँ, तो उस कहानी का वह हिस्सा, वह कमरा और वे किरदार मेरी यादों में किसी फिल्म की तरह जीवंत हो उठते हैं:
“समर उस फूलों से सजे बिस्तर के किनारे बुत की तरह खड़ा था और उसकी मदहोश नज़रें उस लड़की पर टिकी थीं जिसे उसने अपने लड़कपन से टूटकर चाहा था। मेहर… जो आज लाल सुर्ख जोड़े में, भारी गहनों से लदी हुई, किसी सिमटती हुई, छुई-मुई सी कली की तरह उसके सामने सुहागसेज पर बैठी थी। आज समर उसके तन, उसके मन और उसकी रूह का इकलौता मालिक बन गया था। सामान्य तौर पर जिस उम्र में एक लड़के के मन में पहली बार यौन इच्छाओं के बीज फूटते हैं, तभी से वह अपने आस-पास की किसी लड़की को अपनी कल्पनाओं का केंद्र बना लेता है। समर के मामले में वो लड़की मेहर ही थी। उसकी हमउम्र। अनगिनत रातों में, बंद कमरों के अंधेरों में, समर ने अपनी हर कल्पना, हर फैंटेसी में सिर्फ और सिर्फ मेहर को ही नंगा करके जिया था। आत्म-रति (masturbation) के उन पलों में समर की छुअन खुद पर होती थी, लेकिन उसकी बंद आँखों के पीछे का जिस्म मेहर का होता था।
पर आज… आज कोई कल्पना नहीं थी। आज मेहर असलियत में, खून और मांस के एक धड़कते हुए वजूद के रूप में उसकी नायिका बनकर बिस्तर पर बैठी थी। समर के भीतर की वह सालों से दबी हुई आग अचानक ज्वालामुखी की तरह भड़क उठी। उसे एहसास हुआ कि अब वह सिर्फ ख़यालों में नहीं, बल्कि वास्तव में मेहर के इस जवानी से छलकते शरीर को नंगा करने और उसे भोगने का अधिकारी बन चुका है। इस ख़याल के आते ही उसका पौरुष बेकाबू होने लगा। उसका मन किया कि वह अभी एक खूंखार जानवर की तरह मेहर पर टूट पड़े, उसके इन भारी कपड़ों को फाड़ दे और अपनी बरसों की प्यास बुझा ले। लेकिन फिर उसे अपने दोस्तों की वो बातें याद आ गईं कि सुहागरात के दौरान की गई कोई भी जल्दबाज़ी सारी उम्र के लिए एक लड़की के मन में खौफ पैदा कर सकती है। मेहर तो अब ताउम्र उसकी थी, बिस्तर पर उसके सामने थी, तो फिर जल्दी किस बात की? उसने गहरी साँस ली और अपने आप पर काबू पाया।
शुरुआत कुछ मीठी, कुछ सहमी हुई बातों से हुई। समर ने मेहर को सहज होने का पूरा समय दिया। जब कमरे की भारी खामोशी थोड़ी पिघली, तो मेहर ने धीमी सी, काँपती हुई आवाज़ में कहा, ‘आज बहुत गर्मी है… मैं अपने लहंगे का ये भारी दुपट्टा उतार कर रख देती हूँ।’ यह कहकर मेहर ने वो कामुक पर्दा अपने कंधों से हटाकर एक तरफ रख दिया और वापस सिमटकर बैठ गई।
दुपट्टा हटते ही समर की साँसें जैसे हलक में अटक गईं। सुर्ख लाल रंग की उस बेहद गहरी और कसी हुई चोली में मेहर का गोरा बदन किसी पिघलते हुए सोने की तरह चमक रहा था। लहंगे के दर्जी ने शायद अपनी पूरी कारीगरी उसी चोली पर दिखाई थी, क्योंकि उस कसावट में मेहर के दोनों उन्नत उरोज (breasts) मानो फूटकर बाहर आने को बेताब दिख रहे थे। उनकी गोलाई का बड़ा हिस्सा बेपर्दा था। समर की चोर नज़रें बार-बार उसी गहरी खाई की तरफ खिसक जाती थीं। समर के मन में बिजली सी कौंध गई — ‘अगर चोली के ऊपर से इसके उभारों का ये नशीला आलम है, तो जब ये डोरी खुलेगी… जब इसके अंदर की ब्रेसियर का हुक मेरे हाथ खोलेंगे… तब क्या खौफनाक और हसीन नज़ारा होगा?’ इस कल्पना मात्र से ही समर के रोंगटे खड़े हो गए।
अपनी सारी जंगली कल्पनाओं और सुलगती तमन्नाओं को काबू में रखते हुए समर मेहर से इधर-उधर की बातें करता रहा। लेकिन अंत में ऐसा लगा कि शब्द खत्म हो गए हैं। मेहर भी चुप थी। दोनों के बीच एक भारी, कामुक सन्नाटा पसर गया। ऐसे में समर ने हिम्मत की और धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाकर मेहर की मेहंदी लगी, ठंडी और काँपती हुई उँगलियों को अपनी गर्म हथेलियों में ले लिया। वह उन्हें हल्के-हल्के सहलाने लगा। मेहर की तरफ से कोई विरोध या पीछे हटने की कोशिश नहीं हुई। शायद वह भी इसी पहली छुअन के इंतज़ार में थी, बस एक लड़की होने की शर्म उसे पहल करने से रोक रही थी। लेकिन जब समर ने शुरुआत कर दी थी, तो उसने भी खुद को सौंपने का मन बना लिया था।
समर अब इंच-दर-इंच आगे बढ़ रहा था। उसकी गर्म हथेलियों से कलाई, कलाई से बाँह, बाँह से नंगे कंधे, कंधों से सुराहीदार गर्दन… समर के तपते हुए होंठ आगे से आगे बढ़ते हुए मेहर के जिस्म के हर हिस्से पर अपनी मिल्कियत की मुहर लगाते जा रहे थे। जब समर ने मेहर के गालों को चूमकर उसके काँपते हुए अधरों (होंठों) को अपने होंठों में कैद किया, तो मेहर के मुँह से एक दबी हुई सिसकी निकल गई। हर एक गहरे चुंबन के साथ, मेहर के भीतर का बाँध टूट रहा था। वह मोम की तरह पिघल रही थी। उसे लगा कि वह बस पीछे की तरफ गिर जाए, और समर उसे अपने मजबूत सीने के नीचे पूरी तरह दबा ले। वह चाहती थी कि समर अपने इस बलिष्ठ शरीर से उसे कुचल दे और उसे अपनी रगों में उतार ले।
समर के होंठ अब मेहर की गर्दन से नीचे उतरते हुए उसकी छाती के उस बेपर्दा हिस्से के पास पहुँच गए थे, जहाँ उसकी चोली का गहरा कट था। जब समर की गर्म साँसें उन गोरे उभारों से टकराईं, तो मेहर का पूरा शरीर किसी सूखे पत्ते की तरह काँप उठा। वासना ने अब शर्म पर हावी होना शुरू कर दिया था। उसे लगा कि समर उसे जानबूझकर तड़पा रहा है। वह सीधे उन शिखरों को अपने होंठों में क्यों नहीं भर लेता? वह क्यों नहीं वहाँ पहुँचता जहाँ से वह मेहर के यौवन रस का भरपूर घूँट पी सके? यह सोचकर ही मेहर की जाँघों के बीच एक मीठा-सा दर्द और गीलापन महसूस होने लगा कि बस कुछ ही पलों में समर के होंठ उसके वक्षों के कोमल हिस्सों पर बेरहमी से कसे होंगे और वह उन्हें पागलों की तरह चूस रहा होगा।
क्या इसके बाद समर की जीभ उसकी नाभि की गहराई को भी तलाशेगी? क्या उसके हाथ उस मखमली पेट से होते हुए और नीचे… उसकी टांगों के बीच मौजूद उस रहस्यमयी, कुंवारी खाई तक पहुँचेंगे? ‘उफ्फ मेहर! तू इतनी बेशर्म और लज्जाहीन कैसे हो गई?’ मेहर का दिमाग और उसके संस्कार उस पर लगाम लगाने की असफल कोशिश कर रहे थे, लेकिन उसका दहकता हुआ शरीर अब हर सीमा, हर संस्कार को तोड़कर सिर्फ और सिर्फ एक ही चीज़ माँग रहा था — समर का पूरी तरह से अपने अंदर उतर जाना। वासना का ज्वार कुछ इस कदर चढ़ चुका था कि बेचारी मेहर उसमें डूबने के अलावा और कुछ नहीं कर सकती थी।”